पितरों के प्रति कृतज्ञता के निमित्त हैं श्राद्ध

अनिवार्य नहीं कोरोना का हाल में ब्राह्मणों को भोजन कराना । शास्त्र सम्मत है सोशल डिस्टेंसिंग से श्राद्ध कार्य । न पकवान, न दक्षिणा या तीर्थ स्थल पर जाना है श्राद्ध का अपरिहार्य अंग । मन में होनी चाहिए पितरों के प्रति  श्रद्धा , केवल जल अर्घ्य देने से भी खुश हो सकते हैं पितर। पितरों के पृथ्वी पर लौटने व उनके तर्पण के प्रतीक श्राद्ध पूर्णिमा 2 सितंबर से शुरु हो गए हैं। श्राद्धों के बारें में शास्त्रों में कहा गया है श्रद्धया एव सिद्धयति श्राद्धं  अर्थात् -श्राद्ध, श्रद्धा से ही सिद्ध होता है । सही भी है यदि श्रद्धा ही न हो तो फिर ब्राह्मण जिमाने या दान पुण्य करने का कोई मतलब भी नहीं है । हमारी संकृति में तो दिवंगत हो गए पूर्वजों को देवता कहा जाता है और हर  शुभ कार्य से पहले देव पूजन अनिवार्य माना गया है । मान्यता है कि बिना पूर्वजों का आशीर्वाद लिए किए गए कार्य कभी सफल होते हैं न ही उनका सम्यक फल मिलता है । इसी परंपरा को सहेजने का निमित्त हैं श्राद्ध । मान्यताएं, मिथ व कथाएं मान्यता हैं कि जिस व्यक्ति का मृत्यु के पश्चात उपयुक्त विधि विधान से पिंडदान नहीं किया जाता उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है इसलिए हिंदू हर हाल में पितृपक्ष को मनाते है। वहीं  आस्थावान लोग इस माध्यम से दान पुण्य करने व ब्राह्मणों को खुश करके उनके आशीर्वाद लेने का सबब बताते हैं। पितृपक्ष के महत्व को प्रतिपादित करती अनेक कथाएं पुराणों व अन्य साहित्य में मौजूद है जिनमें सबसे  महत्वपूर्ण है भागीरथ द्वारा अपने चौंसठ हजार पुरखों की मुक्ति के लिये कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न करके गंगा को पृथ्वी पर लाकर उनका उद्धार करने की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है। कहा जाता है  कि भगवान श्री रामचंद्र ने भी अपने पिता दारथ की असमायिक मृत्यु के बाद महर्षि वशिष्ष्ठके निर्देशानुसार उनका तर्पण किया था। महाभारत के युद्ध में जब सारे कौरव मारे गए तब श्रीकृष्ण के सान्निध्य में युधिश्ठिर द्वारा  उनके तर्पण की कथा भी मिलती है।

क्या कहता है विज्ञान?
आज विज्ञान व वैज्ञानिक भी जन्म पुनर्जन्म को एक सिरे से खारिज नहीं करते, तब श्राद्ध पक्ष को एकदम से ही खारिज नहीं कर सकते हैं । यहां तक कि पश्चिमी जगत के विद्वान भी जन्म मरण व पुर्नजन्म पर खोज कर रहे हैं  आजकल। श्रीमद्भागवत गीता का मत श्रीमद्भागवत गीता में तो स्पष्ट कहा गया है हन्यो न हन्यामानो जीवात्मा और चौरासी लाख यौनियों में भटक कर, अच्छे कर्म करने से ही मानव योनि मिलती है मान्यता है कि पितरों का तर्पण व पिंडदान करने से उन्हे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्राद्ध से तृप्त होते हैं पितृ
श्राद्ध पक्ष हमें इहलोक व परलोक दोनों के ही अस्तित्व का आभास कराता है । पौराणिक ग्रन्थों में कहा गया है कि श्राद्ध पक्ष में हमारे पितर वायवीय रूप में पृथ्वी पर आते हैं और अपनी संतति को अपनी आत्मा की शांति  के लिये पिंडदान करते देख तृप्त हो पुन: मोक्षधाम को चले जाते हैं।

तर्पण नहीं तो मुक्ति नहीं!
तर्पण का अर्थ है तृप्त करना, माना जाता है कि पितर पृथ्वी पर आकर, अपने वंशजों को सुखी व प्रसन्न देखकर तृप्त होतें हैं। कहा जाता है कि जिन पितरों का तर्पण सही तरीके से नहीं हो पाता, वें त्रिलोक में भटकते रहते  हैं और प्रेत योनि को प्राप्त होकर सांसारिक लोगों को परेशान करते हैं। जो व्यक्ति नि:संतान ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं वें ऊत कहलाते हैं व अतृप्त भटकते रहते हैं मान्यता है कि ऐसे पितरों की तृप्ति के लिये हरिद्वार  में कनखल स्थित प्रेतशिला पर पितृपक्ष में पिंडदान करने से उन्हे मुक्ति की प्रप्त हो जाती है।

क्यों कहते हैं कनागत?
श्राद्धपक्ष या कनागत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुरु होकर सर्व पितृविसर्जनी अमावस्या तक एक पखवाड़े तक चलता है इसी वजह से इस कालखंड को श्राद्धपक्ष के नाम से जाना भी जाता है। पितृपक्ष को  कनागत भी कहा जाताऐसा माना जाता है कि है श्राद्ध पक्ष में पितर कौए के रूप में आकर बलि स्वीकार करते हैं । कुछ लोग श्रीराम द्वारा जटायु के तर्पण को भी इसका एक कारण बताते हैं । श्राद्धपक्ष में नई चीजें खरीदना 
निषिद्ध माना गया है क्योंकि मान्यता है कि इस अवधि में हम अपने पितरों से बिछुड़ने का शोक मनाते हैं।

क्या करें, क्या नहीं
पितरों के तर्पण के लिये संकल्प व आचमन आवयक माने गए हैं अत: ऐसे ब्राह्मण को ही भोजन कराना चाहिये जिसे यें दोनों अच्छी तरह से आते हों। पितरों का याद करते हुए स्वच्छ की गई कुशा या दूब को जल में डुबाकर  छींटे देतेहुए सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। उनकी पसंद का भोजन ब्राह्मणको करवाना चाहिए व यथा संभव दक्षिणा या वस्त्र आदि धारण करवाना भी श्राद्वों का एक अंग माना गया है। शुद्ध व सात्विक विचारों के साथ श्राद्ध  करने पर पितर प्रसन्न भाव से अपने धाम जाकर साल भर के लिये सो जाते हैं व उन्हे आत्मिक शांति मिलती है। पर, कर्ज लेकर या किसी का हक मारकर या अपना मन मारकर अथवा किसी के अहित का भाव लेकर किया  गया श्राद्व कभी नहीं फलता अत: पवित्र मना होकर ही श्राद्व करना श्रेयकर है ।

कोरोना काल की दुविधा और श्राद्ध
इस बार कोरोना संक्रमण के चलते हुए सामाजिक दूरी का तार्किक बंधन श्राद्धों में ब्राह्मणों को भोजन कराने में एक विकट बाधा के रूप में सामने है । श्राद्ध की परंपरा के अनुसार मान्यता यह है कि श्राद्ध तभी फलता है  जब दिवंगत आत्मा का स्मरण करते हुए ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए, उन्हें दक्षिणा दी जाए एवं ब्राह्मणों के द्वारा ही संकल्प कराया जाए। लेकिन वर्तमान समय में जहां ब्राह्मण भी इन कार्यों से बच रहे हैं वही संक्रमण के  भय के चलते श्राद्ध करने वाले भी संभवत: ब्राह्मण को घर बलुाना पसंद न करें। तब क्या श्राद्ध फलीभूत होगा?

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