सही दिशा में सही कदम

वर्षों पहले पारस्परिक बातचीत में एक नेता के उद्गार 'मिशन कर्मयोगी' के बारे में सुनते ही स्मृति पटल पर ताजा हो गये. बकौल उक्त नेता एक जन प्रतिनिधि का पद अस्थायी है. वह किसी पद पर उतने ही समय रहता है जितने समय के लिए उसका निर्वाचन होता है. इसके साथ उसको सदा यह चिंता भी रहती है कि यदि उसे दुबारा चुनकर आना है तो उसका आचार, विचार, व्यवहार और कार्य ऐसा होना चाहिए कि वह दुबारा जनता के सामने जाकर उनका मत माँग सकता है. इसलिए उसे तमाम ताम-झाम करना पड़ता है. लोगों से मेल-जोल के लिए, अतिथि सत्कार के लिए और उनकी सहायता के लिए भारी श्रम करना पड़ता है व खर्च भी करना पड़ता है. जबकि नीचे से लेकर उपर तक की कुर्सी पर बैठा नौकरशाह एक बार चुन लिया गया तो वह जबतक कोई भीषण गलती न कर दे तो सेवा निवृति तक उसकी कुर्सी सुरक्षित रहती है. उसे एक निश्चित समय बाद चुन कर दोबारा आने का कोई दबाव नहीं झेलना पड़ता. काम कैसा भी करें निश्चित समय पर प्रोन्नति तय है, और यदि आकाओं को खुश रखा है तो सेवा निवृति के बाद भी कुछ ना कुछ सेवा विस्तार मिल जाता है. नही तो निजी क्षेत्र में अच्छी खासी नियुक्ति मिल जाती है. समय पर निरीक्षण-परीक्षण की सख्त व्यवस्था न होने के कारण इनमे काम को लेकर बेपरवाही, समय पास करना, खानापूर्ति करना जैसे तमाम दुर्गुण अपने आप आ जाते है. जनता का सेवक कब क्रियाकलाप संपादन में जनता का मालिक बन जाता है, उसे ही नहीं पता चलता. भला हो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जिन्होंने शासन के इस निर्णायक और महत्वपूर्ण घटक की ओर भी अपनी नजरें अपने प्रथम कार्यकाल से ही इनायत की है. इसमें व्याप्त सडांध और काम के प्रति इनकी उदासीनता को झकझोर कर इन्हें भी यह तथ्य याद दिलाने की कोशिश की है कि इस व्यवस्था में वही सुरक्षित है, जो अपने कार्यों का सही ढंग से निष्पादन करता है. सही अर्थों में अपने कर्तव्यों के साथ न्याय करता है. जो अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में कमतर पाया जाएगा उसे घर पर बैठा दिया जाएगा.
यह सिर्फ कहा ही नही गया, ऐसा किया भी गया है. कई कार्य अक्षम, भ्रष्ट नौकरशाह समय से पहले सेवानिवृत किये गये. केंद्र के इस फार्मूले को उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने भी अपनाया. इन सबसे अब इस क्षेत्र की यह तंद्रा टूटी है कि उनका कुछ नहीं हो सकता. सरकारी काम आराम की जगह है, आप कुछ भी करो आपका का कुछ भी बिगडेगा. यही धारणा थी जिसके चलते हमारी नौकरशाही लेटलतीफ़ी और भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात है. अब वह भी सोचने को विवश हो रही है कि यदि उसने अपना काम मेहनत, इमानदारी और समर्पण से नहीं किया तो उसे भी चलता किया जा सकता है. वह जगह दूसरे काबिल व्यक्ति को दी जा सकती है. प्रधानमंत्री यहीं नहीं रुके, उन्होंने हर दृष्टि से नौकरशाही को सक्षम और आद्यतन बनाने के लिए 'मिशन कर्मयोगी' की शुरुवात करने का निर्णय किया है. जिसका ध्येय उन्हें ज्ञान, तकनीकी और व्यवहार से हर रूप में आद्यतन रखना है. जिससे वह अपने कार्य को वक्त की मांग के अनुसार सही, शीघ्र और सटीक ढंग से निर्वाहन कर सके. इसमें कोई दो राय नहीं, कि यदि लिपिक से लेकर देश के सर्वोच्च नौकरशाह तक हर व्यक्ति जबाबदेही के साथ अपने दायित्वों का अनुपालन और निर्वाहन करे तो हमारे देश का चेहरा-मोहरा कुछ और होगा. सरकारी काम है इसलिए देर लगेगी, घटिया होगा, भ्रष्टाचार होगा, समय व श्रम का दुरुपयोग होगा यह मिथक टूटेगा. आगे चलकर देश के हर राज्य की सरकारों को भी इसे अपनाना होगा. देश का हर सरकारी और अर्द्ध सरकारी कर्मचारी पूरी इमानदारी और समर्पण से अपना काम करें, यह सुनिश्चित करना होगा. अब वह दिन लद रहे है, जब सब-कुछ चलता था.

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