सिर्फ खानापूर्ति न हो

आज शिक्षक दिवस है. हमारी सभ्यता में गुरु या शिक्षक का स्थान भगवान से ऊपर बताया गया है. वह गुरू ही है जो छात्र को परम सत्ता से रू-ब-रू करवाता है और सांसारिक समर का वह कैसे सफल योद्धा बन सकता है यह भी सिखाता और पढाता है. व्यक्ति अपने माता-पिता और परिवार के बाद यदि कहीं सबसे ज्यादा समय बिताता है तो वह गुरुकुल या विद्यालय है. इसलिए हमारे समाज में गुरु का हमेशा उदात्त, आदरणीय और पूजनीय स्थान रहा है. मानव सभ्यता के उषा काल से लेकर आज तक उसकी महथाा बनी हुई है, हां स्वरूप जरूर बदल गया है लेकिन काम वही है. भावी पीढी को ज्ञानवान, चरित्रवान और हर तरह से सक्षम नागरिक बनाना. यह काम आज भी पूरी सिद्दत से हो रहा है, लेकिन उसमें कहीं न कहीं बाजारवाद का असर हो गया है. बाकी व्यवसायों की तरह यह भी लाभ-हानि का सौदा हो गया है. ज्ञान के बजाय कमाई पर ज्यादा जोर हो गया है और इसके चलते प्रबन्धन का हस्तक्षेप कुछ ज्यादा बढ़ गया है. साथ ही ऐसे लोगों को ज्ञान दान के संस्थाओं का मालिक बनना जिनके पास धन तो बहुत है लेकिन इस कार्य के लिए जो सेवा भावना की दृष्टि की जरूरत होती है उसका नितांत अभाव है. ऐसे में शिक्षक, आचार्य और गुरु इनकी भूमिका भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा पायी है. शिक्षा और छात्र का वह पहलू आज नहीं दिख रहा है जिसकी गाथा हमारे पुराणों-महाकाव्यों में गायी जाती है. आज शिक्षा का बहुत विस्तार हो चुका है. इतने तरह के कोर्स आ गये है कि छात्र को चुनाव करना मुश्किल है. हर तरह की साधन सुविधाएं आ गयी है. शिक्षा में नयी-नयी तकनीक का उपयोग हो रहा है. पठन-पाठन और पाठम्यक्रमों में काफी तब्दीलियाँ आयी है, जो आवश्यक भी है. हर चीज को वक्त के अनुसार बदलना होता है, जो अपने देश काल की मांगों के अनुसार नहीं बदलता, या तारतम्य नहीं बिठाता वह कालबद्ध हो जाता है और धीरे-धीरे अपनी उपयोगिता खोकर शून्य में विलीन हो जाता है. परन्तु इसके साथ हमे यह भी नहीं भूलना चाहिये कि कुछ चीजें शाश्वत है. आज की पूरी व्यवस्था में जिस तरह से चीजें हो रही है, जिस तरह से बाजार वाद हावी है और जिस तरह का माहौल आज के शिक्षण संस्थानों में हावी है, उससे जिस तरह की शिक्षा और संस्कार छात्रों को पूर्व में परिसर में ही मिलते थे, आज नहीं मिल रहे. उसके चलते आज की युवा पीढी के अधिकांश नौनिहालों में जो नैतिक पतन, मूल्यों की गिरावट व स्वार्थान्धता का दर्शन हम कर रहे है वह चिंता की बात है. यह वह आदर्श स्थिति नहीं है, जिस पर गर्व किया जा सके. जिसका परिणाम है आज ऊपर से बहुत कुछ बदला-बदला सा नजर आ रहा है. परन्तु यथार्थ में जो संबंध और समर्पण गुरु का छात्र के प्रति और छात्र का गुरू के प्रति होता था और उससे छात्र के व्यक्तित्व में समग्रता में जो निखार आता था आज नहीं दिख रहा, वह किताबी ज्ञान का माहिर बनता था. उसके साथ ही साथ उसमें मूल्यों की, नैतिकता
की और परिवार, समाज व जग कल्याण के उत्थान के ऐसे बीजों का भी आरोपण होता था जिससे जब वह दुनिया के समर में अपनी भूमिका निभाने के लिए उतरता था तो उसके क्रिया-कलाप में उसकी विद्वता के साथ-साथ उसके समग्र व्यक्तित्व की समृद्धता में झलकती थी, जो शिक्षा की नींव है. नए माहौल में व्यावसायिक सफलता को ही सब कुछ बना दिया गया है. बाजार के दबाव, लाभ पर जोर और प्रबंधन का अनावश्यक हस्तक्षेप स्कूलों को सिर्फ ज्ञान के कारखाने बना रहे है. वहां चरित्र निर्माण का कार्य करीब करीब रुक गया है. जब कि आवश्यकता दोनों को है. सिर्फ बजार को ध्यान में रखकर उसके लिए उपयुक्त दृष्टिकोण से संस्थानों का संचालन, छात्र का सिर्फ एकांगी विकास ही करेगा. प्रकारांतर से गुरू-शिष्य की हमारी उदात्त परम्पराओं को भुला देगा. हमारी शिक्षा का मतलब छात्र का समग्र विकास होता है, जो उसे देश व समाज का ज्ञानवान, जिम्मेदार और जागरूक प्रहरी बनाता है. दुर्भाग्य से आज यह नहीं हो रहा है. इसके चलते आज देश की युवा पीढी का बड़ा वर्ग तरह-तरह के संकटों का सामना कर रहा है. उसमें वह उसके संस्कार और नैतिक कलेवर का अभाव है जिसका संगम ज्ञान के साथ जरुरी है. गुरु की यही महत्ता है. इसे हमारे नीतिनियंताओ, शिक्षा-संस्थानों के मालिकों अध्यापकों, छात्रों और उनके पालकों को समझना होगा. तद्नुसार काम करना होगा तभी ऐसे दिवस मनाने में सार्थकता है, नहीं तो सिर्फ खानापूर्ति ही होती रहेगी.

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