हिचकोले खाती कांग्रेस

एक जमाना था जब महाराष्ट्र को कोंग्रेस का मजबूत किला माना जाता था, जब कांग्रेस का अपने मजबूत जनाधार वाले उत्तर के राज्यों से सफाया हो गया, तब भी महाराष्ट्र में उसकी पकड़ और साख बनी रही. उस पर पहला कुठाराघात उस समय के कांग्रेस क्षत्रप और आज की राष्ट्रवादी पार्टी के मुखिया शरद पवार ने 1999 की अपनी बगावत से किया. उसके बाद कांग्रेस दो भागों में बाँट गयी और चुनावों में कांग्रेस बंटवारे के बाद भी राज्य में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, और शरद पवार की पार्टी से गंठजोड़ कर 2014 तक सत्ता में बनी रही. 2014 आम चुनाव के लगभग चार वर्ष पहले अशोकराव चौहाण के मुख्यमंत्री की कुर्सी आदर्श घोटाले की भेंट चड़ गयी, और राज्य की बागडोर पृथ्वीराज चौहाण के हाथों आ गयी. उसके बाद दिल्ली से पार्टी प्रभारी के रूप में क्रमश: ए. के.
एन्टोनी और बाद में मोहन प्रकाश के हाथों में राज्य की बागडोर आ गयी. पृथ्वीराज चौहाण पश्चिमी महाराष्ट्र से आते हैं और वह सातारा से सबन्धित है, जो शरद पवार का गढ़ माना जाता है. तो वह पहले ही दिन से अपने को बड़ा नेता साबित करने के लिए और दिल्ली के आकाओं की नजरों में रांकपा को नीचे किया है, यह श्रेय लेने के लिए वह रांकपा को घेरने और उससे पंगा लेने में मस्त हो गये. कारण इसके पहले वे राज्य में नहीं, दिल्ली में ज्यादा सक्रिय भूमिका में थे. जहां तक दिल्ली से महाराष्ट्र प्राभारियों का सवाल है एन्टोनी तो कभी उस दौरान महाराष्ट्र आये ही नहीं, और मोहन प्रकाश महाराष्ट्र में पार्टी सढाा में है, इसी सम्मोहन में इतराने लगे कि पार्टी का राज्य में बेड़ा गर्क हो रहा है, इस ओर ध्यान ही नहीं दिया गया. पृथ्वीराज ने अपना ज्यदातर समय दिल्ली में बिताया था तो राज्य की नब्ज पकड़ नहीं सके, और दोनों ने मिलकर रांकपा से इतना पंगा लिया कि 2014 का चुनाव दोनों अलग-अलग लड़े और डूब गए. उसके बाद राज्य की बागडोर मल्लिकार्जुन खड़गे के हाथों में दी गयी. वरिष्ठ और अनुभवी नेता होने के बाद भी वे पार्टी संगठन में गुटवाद दूर करने में नाकम रहे. विधान सभा चुनाव में पार्टी इतनी हताश थी कि उसने ठीक से जोर भी नहीं लगाया, और मुबई व आसपास के इलाकों से ऐसे-ऐसे लोगों टिकट मिला जिन्हें पूरी मुबई में संगठन के लोग भी नहीं जानते थे और उन पर दलितवाद का आरोप भी लगता रहा. परिणामत: पार्टी की शर्मनाक हार हुई और 40-44 सीटों पर भी जश्न मनाया गया. कारण दिल्ली के आका और यहाँ के नेताओं को इतनी भी सीटें मिलने की उम्मीद नहीं थी. उसके बाद जो हुआ वह और भी हैरतंगेज और हास्यास्पद है. जिस पार्टी से विचारधारात्मक रूप से जिन्दगी भर लड़ते रहे, और जिस रांकपा को खत्म करने के चक्कर में पृथ्वीराज चौहाण ने अपनी पार्टी डुबो दिया. आज उïन्हीं दलों के साथ सढाा में है और सरकार का सारा श्रेय दोनों बड़े दलों यानी शिवसेना और राकांपा के साथ जाने से बेहाल हैं. ऐसे परिदृश्य में कांग्रेस को एक नया प्रभारी कर्नाटक के नेता एच के पाटिल के रूप में मिला है, जो पुराने और अनुभवी नेता है, और कांग्रेस के पुराने तरीकों के कायल है. जबकि आज कांग्रेस को जैसे दिल्ली में सोंच और संगठन की शल्य क्रिया करने की जरूरत है, वैसे ही महाराष्ट्र में भी है, वह तभी सम्भव है जब उस तरह की सोंच और हिम्मत दिल्ली दिखाए. लेकिन दिल्ली अभी भी नयी सोंच को अंगीकार करते नहीं दिख रही है. अभी भी वह परिवार को बचाने में लगी है, जब परिवार सुरक्षित होगा तभी आगे की बात सोची जा सकती है. तब तक महाराष्ट्र कांग्रेस में कुछ अच्छा होगा, ऐसा नहीं लगता. वह अभी भी अनिश्चितता के सागर में गोते लगाने को अभिशप्त है. यदि जल्दी दिल्ली ने कुछ नहीं किया तो यह भी उत्तरप्रदेश और बिहार की तरह उस अवस्था में पहुँच जायेगी जब इसे मुख्य प्रवाह में लाना मुश्किल होगा, और चौथे अथवा पांचवे नम्बर पर ही खेलती रहेगी.

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