सिर्फ फेरबदल ही पर्याप्त नहीं है कांग्रेस के लिए

कांग्रेस में लेटरबम की गूंज पार्टी में काफी समय तक होती रही और उसके बाद कांग्रेस कार्य समिति ने उस पर चर्चा की और अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी का कार्यकाल बढ़ाया गया और उन्हें आवश्यक फेर बदल करने के लिए अधिकृत किया गया. अब उनके द्वारा वह कारवाई शुक्रवार शाम को अंजाम दी गयी, जिसमेें लेटर बम के अगुवा गुलाम नबी आजाद सहित कई नेताओं के पर काट दिये गए और यह सटीक संकेत दे दिया गया है कि आलाकमान की नजर में उनकी निष्ठा संदिग्ध है. भले ही अभी उनमेें से कुछ बड़े पदों पर विराजमान है, लेकिन यदि उन्होंने ज्यादा उल्टा-सीधा किया, तो उनकी हालत और खराब हो सकती है. इस नए फेरबदल में उन्ही पुराने चेहरों को बरकरार रखा गया है, जिनके गांधी परिवार के प्रति निष्ठा असंदिग्ध है. यही मापदंड नयी नियुक्तियों में भी अपनाया गया है. लेटर बम डालने वाले नेताओ में से भी कई को इस फेर बदल में मौक़ा दिया गया है. इसमें वही शामिल है जिन्होने अपनी सफाई दे दी है. साथ ही इसका पूरा ध्यान रखा गया है कि यह पूरी टीम राहुल गांधी की भी वाफादर रहे जिसे साफ है कि राहुल जल्द एक बार फिर कांग्रेस की डोर संभालने वाले है. इसके साथ कांग्रेस अध्यक्ष को सलाह देने के लिए बनी विशेष समिति में भी यही मापदंड अपनाया गया है. बदलाव किसी भी संगठन के लिए अनिवार्य चीज है जो उसमेें नयी ऊर्जा का संचार करता है. लेकिन कांग्रेस में जिस तरह यह हुआ, उससे कई तरह के सवाल पैदा होते हैं. कारण यह अनायास ही नहीं था कि पार्टी के 23 बड़े नेताओं ने सार्वजनिक रूप से पार्टी में व्याप्त मरगल को समाप्त करने के लिए और सडांध दूर करने के लिए अपनी आवाज बुलंद की थी. उसका मकसद पार्टी में उत्साह का संचार करना था, जिससे पार्टी का जो क्षरण हो रहा है उस पर विराम लग सके. पार्टी जिस रसातल में जा चुकी है उसे बाहर आ सके. उसको सार्वजनिक इसलिए किया गया क्योंकि पार्टी में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जहां वे बातें सुनी जाएं. कांग्रेस आलाकमान और चाटुकारों ने इसे जिस तरह बगावत के रूप में लिया और उनके पर कतरने की शुरुवात की है वह सही नहीं है. इससे पार्टी का भला नहीं होगा, पार्टी का भला तब होगा जब कोई आंतरिक मंच विकसित किया जाएगा. जहां नेता पार्टी के हित में कड़वी बातें भी कर सकें. कडवी बाते न सुनना और पार्टी की बिगड़ी हालत सुधारने के लिए अलाकमान द्वारा कोई कदम न उठाना ही वह कारण है जिसके चलते कार्यकर्ताओं और नेताओं में बेचैनी बढ़ रही है और वे लेटर बम जैसे कदम उठाने को बाध्य है. जब तक पार्टी का क्षरण होता रहेगा तब तक पार्टी में उत्साह नहीं आएगा. कांग्रेस को यह लगता है कि वह सिर्फ चाटुकारों या खुशामदगीरों के बलबूते सथाा में वापसी करेगी, तो वह भयानक मुगालते में है. निष्ठा और वफादारी जरूरी है उसके साथ काबिलियत और देश के विभीन्न मुद्दों पर जागरूकता भी जरूरी है. आलाकमान की भक्ति के बल पर ही महत्वपूर्ण बने नेता जिनका धरातल पर आधार नहीं है ऐसे आधारहीन लोग जय तो बोल सकते है, लेकिन पार्टी को पुनर्जीवित नहीं कर सकते. इसलिए आवश्यक है कि पार्टी परिवार की धमक और उसका सम्मान बचाने के साथ-साथ उन मुद्दों पर भी विचार करे, जो पार्टी को लगातार नीचे ले जा रहे. संगठन का देशव्यापी ढांचा मजबूत करेे. कार्यकर्ताओं में व्याप्त विचारधारात्मक उहापोह दूर करे. निष्ठावान, वफादर और काबिल विचार वाले नेताओं को तरजीह दे. तब तो बात बनेगी, अन्यथा यहा जो कुछ भी फेरबदल किया है वह फिजूल साबित होगा.

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