पर्यटन का सर्वांगी विकास जरूरी

हमारे देश को लेकर जो विभिन्नताओं के बीच एकता की बात की जाती है वह सिर्फ राजनीति तक ही सीमित नहीं है, उसका व्यापक अर्थ है. उसका संबन्ध उस संस्कृति से है जो भाषा, क्षेत्र, वेषभूषा और खान-पान की बाहरी विविधताओं के बावजूद भी विशुद्ध भारतीय है, जिसके दर्शन हम सब के अन्दर होते है. वह इस कदर हमारे अंतरमन में अन्तर्निहित है कि बाहरी यानी दूसरे देश के व्यक्ति को जल्दी समझ में नहीं आती, वह इसे देख कर भौंचक्का रह जाता है. हम आनंदातिरेक में गोते लगाते हैं, और विदेशी यह समझ नहीं पाता कि यही हमारी एकता व मजबूती का सबसे बड़ा कारण है. हम हर व्यक्ति को उसके ऊपर दिखने वाली विषमता के साथ गले लगाकर अपनाते है, क्योंकि हम जानते हैं कि इस उपरी विविधता के अंदर जो दिल है उसमे से एक आवाज़ आती है जो भारतीयता की है. आवश्यकता इस आवाज व एकता को और पुष्ट करने की है. इसके लिए हमें अंतर्देशीय पर्यटन को और बढ़ाने की जरूरत है. दुर्भाग्य से स्वतंत्रता काल से लेकर देश में मोदी युग के प्रारम्भ तक इस दिशा में कोई सोचा-विचारा ठोस कदम नहीं उठाया गया, सिर्फ खानापूर्ति होती रही है. लम्बे समय तक देश का पूर्वोत्तर हिस्सा देश के मुख्य प्रवाह से उस तरह नहीं जुड़ पाया, जैसा होना चाहिये था. जबकि देश की संस्कृति के कई महत्वपूर्ण तार देश के इस सामरिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाकें से जुड़ते है, और इसके बिना जैसे हमारे गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को कहा कि देश की संकृति अधूरी है, प्रकृति ने हमारे देश को कुछ ज्यादा ही मोहब्बत से संवारा है. दुनिया के हर मौसम का आनंद हम अपने देश में उठा सकते है, हर इलाके की अपनी अलग पहचान और सौंदर्य है. हम समय-समय पर हर तरह की भौगोलिक स्थितियों का आनंद अपने ही देश के कोने-कोने में उठा सकते है. हमारे देश में अंग्रेजो की गुलामी जो लम्बे काल तक रही और जिसके चलते यूरोप अमेरिका को लेकर हमारे अन्दर जो कौतूहल रहा है, उसके चलते ज़रा भी सक्षम होते ही हम पर्यटन के लिए उसी ओर रवाना होते है, और उसी ओर अपनी चाल बढ़ाते है. इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती है. वह करें लेकिन अपने देश की विविधताओं से रूबरू होने और लोगों से, अपनी विरासत से जुड़ने और जोड़ने के, पारस्परिक मेल-जोल से अपने सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर गवाने की कींमत पर नहीं. हमारे पास हर तरह के पर्यटन स्थलों की एक समृद्ध विरासत
और धरोहर है. हमारे यहां धार्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक हर तरह के स्थल है जहां हर पर्यटक को अपनी रूचि के अनुसार और दुनिया से सस्ता और अच्छा अनुभव प्राप्त हो सकता है. लेकिन वहां पर्याप्त संख्या में पर्यटक के न आने से वैसी व्यवस्था का अभाव है. इसके चलते वहां के लोग भारी मात्रा में रोजगार से वंचित होते हैं, साथ ही देश और उस राज्य का भी नुकसान होता है जो कई तरीके से अपने राजस्व में वृद्धि कर सकते है. इसके अलावा आय का श्रोत बढ़ने से इन पुरातन धरोहरों का रख-रखाव भी अच्छी तरह से हो सकता है. मोदी युग में इस दृष्टि से काफी तेजी से काम हो रहा है और राज्य सरकारें भी इस दिशा में प्रयत्नशील है, जिसका असर भी हो रहा है. रविवार को देश ने पर्यटन दिवस मनाया, सरकार को जो करना है कर रही है, और हर देशवासी इस कार्य में अपने-अपने स्तर पर सक्रिय है. अवसर के अनुसार देश के कोने-कोने में जाये और अपने यहां भी नए आनेवाले पर्यटकों को अपने अचार और व्यवहार से निहाल करें जिससे देश की अर्थव्यवस्था में पर्यटन को जो मुकाम हासिल होना चाहिए वह मिले और देश के विकास में अपना सही योगदान दे सके.

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