रोजगार की बात

आगामी महीनों और सालों में कई प्रदेशों में चुनाव होने वाले हैं फिर से लोक लुभावने वादे किए जाएंगे। कोरोना काल में करोड़ों लोगों ने नौकरी और रोजगार गंवाया है। ऐसे में विपक्षी दल बेरोजगारी को मुद्दा बनाएंगे, जब एक तरफ केन्द्र सरकार निजीकरण की ओर बढ़ रही है तो दूसरी ओर उस पर इस बात का दबाव है कि वह युवाओं के लिए अधिक से अधिक सरकारी नौकरियों की व्यवस्था करे। देश का करीब 75 प्रतिशत पढ़ा-लिखा युवा अपने पैरों पर खड़े होने का मतलब येनकेन प्रकारेण सरकारी नौकरी हासिल कर लेना ही समझता है। आश्चर्य होता है कि समाज का बड़ा तबका अपने बच्चों को शिक्षा तो निजी स्कूलों में दिलाता है, लेकिन उनको नौकरी सरकारी कराना चाहता है। ऐसा क्यों है यह समझना मुश्किल नहीं है। अपने देश में सरकारी नौकरी को 'स्टेट्स सिंबल' माना जाता है। सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए लोग पानी की तरह पैसा बहाने में भी गुरेज नहीं करते हैं। सरकारी नौकरी का मतलब जीवन में सब कुछ 'हरा ही हरा' होना है। पूरी जिंदगी को 'सरकारी गारंटी' मिल जाती है। इसीलिए हमारे युवा वर्षों तक एक अदद सरकारी नौकरी के लिए इधर-उधर भटकते रहते हैं।
दरअसल, प्राइवेट जॉब, स्वत: रोजगार या निजी व्यवसाय के मुकाबले सरकारी नौकरी के लिए योग्यता का पैमाना बहुत सीमित होता है, एक बार सरकारी नौकरी का ठप्पा लग जाने के बाद पूरी सेवा के दौरान न तो कोई छँटनी होती है, न काम की समीक्षा। अगर होती भी है तो औपचारिकता से अधिक कुछ नहीं होता जबकि वेतन और अन्य सुविधाएं भरपूर और समय पर मिलता रहता है। सरकारी नौकरी की यही खूबी उसे आम से खास बना देती है, इसलिए हर युवा सरकारी नौकरी की तरफ भागता है। यह सच है कि समय के साथ नई पीढ़ी का सरकारी नौकरियों की तरफ से रू झान थोड़ा कम हुआ है, लेकिन अभी भी सरकारी नौकरी चाहने वालों का हुजूम ज्यादा ही है। 21वीं सदी में जिन युवाओं-युवतियों का सरकारी नौकरी की तरफ से मोह भंग हुआ है, उन्हें अपनी योग्यता और मेहनत पर ज्यादा भरोसा रहता है, इसीलिए वह अपना भविष्य संवारने के लिए प्राइवेट सेक्टर में जॉब करना ज्यादा पसंद करते हैं। जहां मेहनती और ईमानदार कर्मचारियों को बड़ी-बड़ी कम्पनियां मोटे वेतन पर भी रखने से गुरेज नहीं करती। इसी तरह तमाम युवक सरकारी नौकरी की बजाए अपना व्यवसाय करना ज्यादा सही समझते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि अपने व्यवसाय में वह जितनी मेहनत करेंगे उतना करोबार बढ़ेगा, लेकिन जिनके मन में सरकारी नौकरी की चाहत होती है, वह न जाने कब नौकरी तलाशते-तलाशते सियासत का मोहरा बन जाते हैं। यह वह भी नहीं समझ पाते हैं। सरकारी नौकरी की चाहत में बेरोजगार घूमने वाले युवाओं के अपने जीवन में तो कठिनाई बनी ही रहती है, साथ ही तमाम दलों और नेताओं के लिए यह बेरोजगार वोट बैंक बन जाते हैं और नेतागण इन्हीं के कंधों पर रखकर निशाना दागते हैं। यहां तक कि यह बेरोजगार सत्ता परिवर्तन तक कराने में सक्षम हो जाते हैं। हर चुनाव में बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा रहता है। बेरोजगारी का मुद्दा आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में भी उछलेगा और उत्तर प्रदेश या अन्य राज्य भी चुनाव के समय इससे अछूते नहीं रहेंगे।

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