नेपाल को अब सद्बुद्धि आ रही है

ऐसा प्रतीत होता है कि अब नेपाल को भी चीन की हकीक़त का एहसास होने लगा है. उसकी दोस्ती का मतलब ही होता है पहले अपने जाल में फंसाना और अपनी भूमिपिपासा शांत करने के लिए उसका शोषण करना. उसने श्रीलंका के साथ भी यही किया, हंबनटोटा बन्दरगाह गवाने के बाद उसे होश आया. मालदीव भी उसके सिकंजे में कसमसा रहा है और नेपाल के मुखिया ओली, जिन्होंने उसके उकसाए में आकर हमसे पंगा लेने की हिमाकत की. कुछ जमीन नेपाल की भी चीन के कब्जे में जा चुकी है. साथ ही उन्होंने यह भी देख लिया कि भारत अकेले ही चीन और पाकिस्तान को पूरा पड़ रहा है, और नेपाल के भी चीन के सुर में सुर मिलाने पर भी भारत को कोई दिक्कत नहीं हुई. अलबत्ता पकिस्तान और चीन को लेकर हमारी आक्रामकता और बढ़ गयी है. अनायास ही हमें छेड़ने से नेपाल के जन-मानस का एक बड़ा वर्ग और उसके तमाम नेताओं का क्रोध भी उन्हें झेलना पड़ रहा है. कारण जिस नि:स्पृह भाव से हम नेपाल की मदद करते आये है और जिस तरह के हमारे उसके साथ रोटी-बेटी के सबंध हैं वैसा चीन अपनी रियाया के साथ भी नहीं करता है. लगता है कि इन सब बातों का असर अब ओली पर भी हो रहा है. चीन अपने सड़ियल माल से पहले उस देश को पाटता है फिर उसे कर्ज के जाल में फंसाता है, और फिर उसे अपनी कठुपुतली बनाता है. गोरखा स्वाभिमानी कौम है, ओली जैसे कुर्सी प्रेमी मुखिया अपने स्वार्थों के लिए ड्रैगन की फुफकार पर नृत्य कर सकते है, परन्तु उनकी स्वाभिमानी आवाम ऐसा नहीं कर सकती. यह नेपाल में उनकी नीतियों के विरोध से उजागर है. ओली को इसका एहसास है इसलिए उन्होंने पंद्रह अगस्त को हमारे प्रधानमन्त्री को बधाई देकर रिश्तों में आई खटास को कम करने का प्रयास किया और अब उत्तराखंड के जिन हिस्सों को अपना बताते हुए ओली ने नया नक्शा बनवाया था और उन्ही नक्शों को लेकर जो किताब वहां छपी है उस पर रोक लगा दी है और आगे का वितरण रोक दिया गया है. उम्मीद है कि ओली इतने पर ही नहीं रुकेंगे, चीन के भुलावे में आकर उन्होंने जो हिमाकत की थी, वह आत्मघाती था. इसका पूरा एहसास उन्हें होगा और दोनों देशों के रिश्तों को पटरी पर लाने के लिए जो काम उन्होंने शुरू किया है उसे अंजाम तक पहुंचाएंगे, तभी दोनों देशों के रिश्तों में अतीत का अपनापन और गर्मी फिर बहाल होगी. आज चीन का हमारे पड़ोसियों को अपनी ओर करने की कुटिल नीति पूरी तरह विफल है. कारण है कि हमने कभी किसी पड़ोसी देश को किसी जाल में फंसा कर उसका शोषण करने का और उनकी जमीन कब्जाने का काम नहीं किया, बल्कि वहां भी शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का ही नारा बुलंद किया. जिसमें इस तरह चलने का प्रयास रहा है कि दोनों का सकारात्मक विकास हो. जबकि चीन जैसा राष्ट्र दादा गिरी, धमकी और षडयंत्र रचना, अपनी विदेश नीति मानता है. आज के इस 21वीं सदी के युग में विस्तारवादी और हड़प-नीति का सपना देखता है, हमारी तरह कभी सोच ही नहीं सकता. उसके साथी उसकी ही तरह के सोंच वाले हो सकते है, इसलिए पाक और उत्तर कोरिया उसके मित्र है. कारण दोनों की राजनीति भी ऐसे वादों का शिकार है जो दुनिया के लिए खतरा है, और दुनिया की चिंता बढ़ा रहा है. उन्हें भी दुनिया चीन की ही तरह शंका से देखती है, और उनका भी इलाज ढूंढने में लगी हुई है, इनका इलाज होगा, अच्छा है कि नेपाल को अब सद्बुद्धि आ रही है, नहीं तो उसकी भी गत कुछ वैसी ही होती

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