तू डाल-डाल तो मैं पात-पात

हमारी सामरिक और कूटनीतिक घेराबंदी से भले ही चीन अचकचाया हुआ है लेकिन उसकी ख़ुराफ़ात अभी भी बंद नहीं हुई है. बड़े ही तैयारी से उसने हमारे इलाके में अपनी विस्तारवादी योजना को लागू करने की कोशिश की थी. वह किस तरह उसके गले की फांस बन चुकी है, इसका उसे एहसास हो गया है. जिस तरह रूस में उसके रक्षा मंत्री हमारे रक्षा मंत्री से मिलने के लिए अधीर नजर आये और उनके होटल तक पहुँच गये, वह अपने आप में बहुत कुछ कहता है. लेकिन क्षण-क्षण में रूप बदलने वाले चीन पर सहजता से विश्वास नहीं किया जा सकता. इसके लिए चीन को अभी बहुत पापड़ बेलने होंगे. यह भी हमारे रक्षा मंत्री ने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में उन्हें बता दिया है. अब भरोसे की पहल चीन को ही करनी है और अप्रैल की स्थिति तक पीछे जाना है जिसके बिना शांति की कोई गुंजाइश नहीं है. यह भी दिन के उजाले की तरह साफ़ कर दिया गया है. यही नहीं अपनी संप्रभुता और सीमा की रक्षा करने की हमारी तैयारियों और क्षमताओं का भी अंदाजा उसे लग गया है. वह इसे डोकलाम से लेकर गलवान और उसके बाद ब्लैक टॉप तक देख रहा है. यही नहीं उसके बाद भी उसकी घुसपैठ की कोशिशें किस तरह हमारी सतर्क और जाबांज सेना लगातार नाकाम कर रही है. इसका भी अनुभव वह रोज ले रहा है. संक्षेप में रोज सामरिक मोर्चे पर हमसे करीब-करीब मुहँ की खाने के बाद, कूटनीतिक मोर्चे पर भी शिकस्त खाने और आर्थिक रूप से भी रोज हमारे नए-नए प्रहार झेलने के बाद चीन द्वारा अभी भी अपनी गलती सुधारने का ईमानदार प्रयास नहीं हो रहा है. वह रूस में हमारे रक्षा मंत्री से एक तरह से गिडगिडाये शैली में बातचीत की कोशिश कर रहा था. किसी तरह से बातचीत होने के बाद भी लद्दाख सीमा में बार-बार उसके द्वारा घुसपैठ का प्रयास हो रहा है. यही नहीं अब वह बड़े ही नाटकीय ढंग से अरुणाचल में हमारे पांच नागरिकों के उनकी सीमा में होने की बात स्वीकार कर रहा है. साथ ही जिस तरह से अभी भी वह नेपाल को उकसाने में लगा है और अपने पुछल्ले पाकिस्तान को रोज नए-नए खतरनाक और अद्यतन हथियार दे रहा है, मतलब साफ है कि उसकी नीयत अभी भी हमारे प्रति सही नहीं है, उसमे खोट है. वह दुनिया के दिखावे के लिए रूस जैसी गिड़गिड़ाने की शैली का ढोंग कर रहा है, यही उसकी भूल है. वह कितना गैर भरोसेमंद है और कितना बड़ा धोखेबाज़ है यह अब दुनिया को बताने की जरूरत नहीं है. जिस तरह उसका पिठ्ठू पाक दुनिया में आतंक के मक्का के रूप में कुख्यात है उसी तरह अब चीन की भी विस्तारवादी नीतियों का, उसकी कुटिलता का और उसकी अविश्वसनीयता का डंका दुनिया में बज चुका है. पाक और उत्तर कोरिया के शिवाय दुनिया में उसका कोई हामी नहीं है. साथ ही ये दोनों भी क्यों उसके साथ है? और वह क्यों उनका साथ दे रहे है? यह दुनिया जानती है. पाक की जो दुर्गति आज है, वह उसका आका होने केे नाते चीन जानता है. वैसी ही हालत उत्तर कोरिया की भी है और चीन भी उसी राह की और तेजी से जा रहा है. वह कितना मर्यादाहीन देश है यह उसने कोरोना का दुनिया भर में निर्यात कर जता दिया है. उसने इतने देशों को दुखाया है की अब दुनिया मौके की ताक में है. रही बात हमारी तो चीन ने ही हमें यह सिखा दिया कि यदि सामने वाला डाल-डाल चलता है तो कैसे पो पो पर चलकर उसका मुकाबला किया जाता है. चीन इसका स्वाद रोज चख रहा है. उसके खिलाफ हमारी कूटनीतिक और सामरिक नीति की सफलता से और उस पर हमारे द्वारा किये जा रहे आर्थिक प्रतिबंध रूपी प्रहार से उसके पसीने छूट रहे है. समझदार देश इससे सबक लेता है, इसलिए चीन को कम से अब तो सद्बुद्धि आनी चाहिए और ईमानदारी से उसे अप्रैल की स्थिति तक वापस जाकर हमारे साथ भरोसे के माहौल में बात करनी चाहिये. 'मुंह में राम बगल में छूरी' वाली उसकी चिर परिचित नीति उसी को ले डूबेगी.

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