विरोध या मजबूरी

कृषि बिल को लेकर मोदी सरकार में शामिल शिरोमणि अकाली दल ने न केवल लोकसभा में इसका विरोध किया, बल्कि इसके बाद शिरोमणी अकाली दल की नेता और फूड प्रोसेसिंग मिनिस्टर हरसिमरत कौर बादल ने किसान बिल के विरोध में मोदी सरकार से इस्तीफा भी दे दिया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस्तीफा मंजूर भी कर लिया है। इसके बाद इस मंत्रालय का प्रभार कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को सौंपा गया है। अब प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया कि किसानों को भ्रमित करने में बहुत सारी शक्तियां लगी हुई हैं। मैं किसान भाइयों-बहनों को आश्वस्त करता हूं कि ये विधेयक सही मायने में उन्हें सशक्त करने वाले हैं।दूसरी तरफ हरसिमरत ने कहा कि उन्होंने किसानों के खिलाफ लाए जा रहे बिल को लेकर केंद्रीय कैबिनेट के मंत्री पद से इस्तीफा दिया है। गर्व है कि मैं अपने किसानों के साथ उनकी बहन और बेटी के तौर पर खड़ी हूं।इस घटनाक्रम का अर्थ सियासी पंडित अपने अपने तरीके से लगा रहे हैं लेकिन पंजाब की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकारों की मानें, तो अकाली दल के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल से निकलना ही एक मात्र विकल्प था। संविधान के मुताबिक़, अकाली दल अगर मंत्रिमंडल में शामिल है, तो कैबिनेट का फ़ैसला मानना उनकी बाध्यता है। उनके पास इस्तीफ़ा देने के अलावा कोई दूसरा चारा ही नहीं बचा था। अकाली दल इस पूरे घटनाक्रम को 'त्याग' बना कर पेश नहीं कर सकती है।1992 तक बीजेपी और अकाली दल अलग-अलग चुनाव लड़ती थी, और चुनाव के बाद साथ आते थे। 1996 में अकाली दल ने 'मोगा डेक्लरेशन' पर साइन किया और 1997 में पहली बार साथ में चुनाव लड़ा।
तब से अब तक इनका साथ बरक़रार है। मोगा डेक्लरेशन में भी तीन बातों पर ज़ोर दिया गया था- पंजाबी आईडेंटिटी, आपसी सौहार्द और राष्ट्रीय सुरक्षा। 1984 के दंगों के बाद इस आपसी सौहार्द का माहौल काफ़ी ख़राब हो गया था और इसलिए दोनों पार्टियाँ साथ आईं।अकाली दल अपने सिख वोट बैंक के साथ अकेले सत्ता में आने की स्थिति में नहीं थी। वो एकजुट होकर वोट नहीं करते थे। तो उन्हें एक ऐसी पार्टी की तलाश थी जो उनके वोट बैंक को छीनता नहीं बल्कि बढ़ाता।ऐसे में बीजेपी ही उनके पास एक मात्र विकल्प था, क्योंकि एक मज़बूत पार्टी दूसरे नंबर की मज़बूत पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करती। कांग्रेस उनके लिए गठबंधन का विकल्प नहीं हो सकती थी।
पंजाब में एक ही पार्टी है, जो दो बार लगातार चुनाव जीती है और वो है अकाली दल। 2017 में उनकी इतनी बुरी हार होगी, इसका अंदाज़ा किसी को नहीं था। 117 सीटों में से पार्टी केवल 15 सीटों पर सिमट कर रह गई। इतनी पुरानी पार्टी को मुख्य विपक्ष का तमग़ा भी नहीं मिला।अकाली दल का 'जाट वोट बैंक' भी खिसक गया है। जाट ही ़ज्यादा संख्या में पंजाब में खेती करते हैं।अकालियों को इस बार का डर था कि किसानों के इस मुद्दे पर किसानों का विरोध करके वो
अपने रहे सहे वोट बैंक से भी हाथ ना धो बैठे। राज्य में आम आदमी पार्टी की एंट्री ने उनके लिए पहले से ही मुश्किलें खड़ी कर रखी है। कैप्टेन अमरिंदर सिंह ख़ुद को ऑल इंडिया लीडर के बजाए पंजाब के लीडर के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहे हैं, जिसमें बहुत हद तक वो कामयाब भी रहे हैं।इतना ही नहीं हाल ही में पार्टी को टूट का भी सामना करना पड़ा है। पार्टी के पुराने नेता सुखदेव सिंह ढींडसा ने अपनी अलग पार्टी बना ली है। अभी विरोध के दूसरे स्वर शांत भी नहीं हुए हैं, ऐसे में पार्टी कोई नया मुद्दा विपक्षी पार्टियों को देना नहीं चाहती थी। हरसिमरत कौर बादल ने मंत्रीपद से इस्तीफ़ा भले ही दिया हो, लेकिन अकाली दल अब भी एनडीए का हिस्सा है। एनडीए से निकलने पर पार्टी ने आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा है। राज्यसभा सांसद नरेश गुजराल का कहना है पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में इस पर फ़ैसला होगा कि हम एनडीए से समर्थन वापस लेंगे या साथ जारी रहेगा। हम देश की ताज़ा परिस्थितियों से पूरी तरह वाकि़फ़ हैं। भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान सीमा पर इस समय कैसे हालात हैं। हम ऐसा कोई क़दम नहीं उठाएँगें, जो देश या सरकार को कमज़ोर करे।उनका ये बयान साफ़ इशारा करता है कि पार्टी ने एनडीए से निकलने के बारे में नहीं सोचा है।कई कारण हैं, जिनकी वजह से अभी ये गठबंधन चलता रहेगा।पंजाब की सीमा पड़ोसी देश पाकिस्तान से लगी है। बॉर्डर स्टेट होना एक बड़ा फ़ैक्टर है और पंजाब से खु़द को बीजेपी पूरी तरह अलग नहीं करना चाहेगी। बीजेपी में अरुण जेटली ऐसे नेता थे, जो इस गठबंधन के समर्थन में थे। उनके जाने के बाद से इसमें दरार पड़नी शुरू हो गई थी। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी भी पाँच साल पंजाब में रह चुके हैं, उन्हें भी पंजाब की राजनीति का पूरा ज्ञान है।'एक सच्चाई ये भी है कि बिहार चुनाव तक तो बीजेपी भी चाहेगी कि गठबंधन ना टूटे, ताकि जनता में ये संदेश ना जाए कि बीजेपी को अपने एलायंस पार्टनर की फ़िक्र नहीं। अकाली दल की अंदरूनी दि़क़त की वजह से वो भी इस गठबंधन का हिस्सा बने रहना चाहेगी।लेकिन सबसे ़ज्यादा ख़राब स्तिथि बीजेपी की है। उनका कोई चेहरा वहाँ है नहीं और अकाली दल का साथ छूटने के बाद पार्टी का कोई राजनीतिक एजेंडा भी नहीं बचेगा। इसलिए वो पूरी कोशिश करेंगे कि अकाली दल, बाहर से समर्थन देती रहे और दोनों साथ ही रहें।

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