साठे साठम्यम समाचरेत

पुरानी कहावत है दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार ही सही है. उसे वही सुधार सकता है. जब तक हम चीन के साथ इस उम्मीद से नरमी का व्यवहार करते थे कि वह हमारा पड़ोसी है, दोनों प्राचीन सभ्यताएं है, दोनों का मेलजोल और साथ आना इस सदी को एशिया की सदी बना सकता है. तब तब चीन ने हमेशा विश्वासघात ही किया. पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के हिंदी चीनी भाई-भाई के नारे का जो प्रतिसाद उसने 1962 में दिया और हमारी जमीन का एक बड़ा इलाका हड़प लिया. उसे कोई माकूल जबाब हमारी तरफ से तब तक नहीं मिला जब तक भारतीय सत्ता शिखर पर मोदी युग का आगाज नहीं हुआ. समय-समय पर उसकी बेजा हरकतें जारी रही, और हमारे कांग्रेसी निजाम उससे दयानतदारी का, उसे सद्बुद्धि आने का इंतजार करता रहा और उसने इसे हमारी कमज़ोरी समझा. उत्तराखंड से लेकर अरुणाचल तक यत्र-तत्र अपनी सीमा होने का निराधार दावा करता रहा और घुसपैठ की कोशिश करता रहा. उसने हमेशा हमारे खिलाफ पाकिस्तान को साथ रखा और उसे शह और सहयोग देता रहा. यह खेल एक-दो दिन का नहीं है, दशकों से चला आ रहा है. ऊपर से दोस्ती का दिखावा और अन्दर से छुरी घोपने का सतत प्रयास यही उसका चरित्र रहा है. इसकी आड़ में उसने हमसे व्यापार में भी अच्छा खासा माल कमाया. हमसे एक पैसे का समान लेता था और पांच पैसे का माल हमे देता था. इसमें संतुलन बनाने की बाते उसके कानों में सुनायी नहीं देती थी, ऊपर से दोस्ती कर व्यापार में पांच गुना लाभ कमाता रहा और अन्दर ही अन्दर कभी पाकिस्तान के माध्यम से तो कभी अन्य अनुचित और अनैतिक तरीके से हमें कमजोर करने में लगा रहा और हमारी जमीन हथियाने का प्रयास करता रहा. आखिर सब्र की भी एक सीमा होती है. डोकालाम में हमारे दृढ़ निश्चय और सफल प्रतिकार का स्वाद चखने और यह अंदाजा होने के बाद कि आज भारत बासठ का भारत नहीं है. आज के भारत के निजाम का तौर-तरीका कांग्रेसी निजामों जैसा नहीं है उसने फिर भी वही किया जो उसकी आदत है. लद्दाख में उसने हमारी जमीन हथियाने की कोशिश की परिणाम गालवान के रूप में सामने आया, जहां हमारे जवानों के साहस और पराक्रम ने उसके कुत्सित मंसूबों को तार-तार कर दिया. उसके धोखे में हमारे भी 20 जवान शहीद हुए, परन्तु इसमें उसके भी हमसे तीन गुना ज्यादा जवान मारे गये और उस इलाके से उसे वापस जाना पड़ा. समझदार आदमी उसके बाद सारे इलाके से हट जाता, परंतु दोगलेपन की नयी परिभाषा का प्रतीक चीन कैसे वह कर सकता है? तो बातचीत के मध्य जब उसने पैन्गोंग झील के दक्षिणी किनारे पर कब्जा करने की कोशिश की, तो हमारे जवानो ने उसके मंसूबे पर पानी फेरते हुए उस पर कब्जा कर लिया. अब उस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाके पर हमारा झंडा लहरा रहा है. रही सही कसर तीसरी डिजिटल स्ट्राइक ने पूरी कर दी तो अब इस दोहरी मार से चीन का तिलमिलाना स्वाभाविक है. यही वह तरीका है जो चीन की समझ में आता है और जिसे अपनाने को हमारा देश दृढ़ प्रतिज्ञ है. उसे हमारी जमीन के हर इंच से वापस जाना ही होगा. वैसे भी लगता है कि उसके दिन अब लदने वाले है. वह पहले ही अपनी दादागीरी से, समुद्र से लेकर कर भूमि तक अपनी हवाई दावेदारी से, हांगकांग, तिब्बत पर अपने आत्याचारों से दुनिया का कोप भाजन है. रही सही कसर उसने कोरोना को जन्म देकर और उसे दुनिया भर में फैला कर पूरी कर दी है. इससे उसने दुनिया का जन-जीवन तहस-नहस कर दिया है. सब मौके की ताक में है. इसका उसे ताइवान की ललकार और इंडो चाइना सी में सेनाओं और वायुयानों की गर्जना से आभास हो रहा है. मतलब साफ़ है कि हम ही नहीं दुनिया के सारे देश उस पर गिद्ध दृष्टि लगाए इस इंतजार में है कि वह कोई गलती करें. कारण सबको अब यह मालूम हो गया है कि सठ के साथ सठता का व्यवहार ही उसे राह पर ला सकता है और उस पर लगाम लगा सकता है. चीन अपने कुकर्मों से इसी अवस्था को पहुँच चुका है, अभी भी सद्बुद्धि आये तो ठीक नहीं तो उसका अपने ही बनाये जाल में फसना तय है.

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