चुनावी समीकरण बिगाड़ सकते हैं प्रवासी मजदूर

 पटना 
चुनाव आयोग ने शुक्रवार को बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी। कोरोना काल में पहला चुनाव बिहार विधानसभा का हो रहा है। कोरोना संक्रमण काल की शुरुआत में बिहार से पलायन कर चुके प्रवासी मजदूर घर लौटने लगे थे। हालांकि, कुछ मजदूर वापस लौट गये हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने बताया कि बिहार के 38 जिलों में करीब 18.87 लाख प्रवासी थे. इनमें से 16.6 लाख मतदान करने के योग्य थे। इनमें से 13.93 लाख प्रवासी मजदूरों के नाम पहले से ही मतदाता सूची में थे। वहीं, करीब 2.3 लाख मजदूरों ने मतदान के लिए पंजीकरण कराया है। पंजीकरण की प्रक्रिया अब भी जारी है। ये प्रवासी मजदूर बिहार में चुनावी समीकरण बिगाड़ सकते हैं। 
मुख्य चुनाव आयुक्त के मुताबिक, बिहार के 38 जिलों में 18.87 लाख प्रवासी थे। 
इन प्रवासी मजदूरों की भूमिका चुनाव में अहम साबित हो सकती हैं। कोरोना काल में दूसरे राज्यों से बिहार लौटे श्रमिक विधानसभा चुनाव में बाजी पलट सकते हैं। साल 2015 के आंकड़ों के मुताबिक, आठ विधानसभा सीटों पर हार-जीत का अंतर एक हजार से कम का था। हालांकि, बीजेपी और जेडीयू-हम के एक साथ आने के बाद दो सीटों पर असर नहीं पड़ेगा। झंझारपुर में राजद ने बीजेपी को 834 वोट, बनमखी में बीजेपी ने राजद को 708 वोट, बरौली में राजद ने बीजेपी को 504 वोट, आरा में राजद ने बीजेपी को 666 वोट, चैनपुर में बीजेपी ने बीएसपी को 671 वोट, तरारी में भाकपा-माले ने एलजेपी को 272 वोट से शिकस्त दी थी. वहीं, चनपटिया में बीजेपी ने जेडीयू को 464 वोट और शिवहर में जेडीयू ने हम को 461 वोट से हराया था। 
वहीं, अगर पांच हजार के अंतर के आंकड़े पर नजर डालें तो 25 सीटों पर हार-जीत हुई थी। इन 25 सीटों में सात सीटें ऐसी थीं, जिनमें बीजेपी-जेडीयू के बीच सीधा मुकाबला था 

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