फारूक की तोतारटंत निंदनीय

अनुच्छेद 370और 35ए हटे साल भर से ज्यादा समय बीत चुका है. शायद ही कोई दिन ऐसा रहा हो जब हमारे सुरक्षा बल आतंकवादियों से दो-दो हाथ नहीं कर रहे होते. रोज आतंकी जहन्नुम रशीद किया जा रहे है. बावजूद इसके वह कहीं न कहीं से प्रकट हो ही जाते है. तिस पर भी शासन-प्रशासन का काम सही तरीके से चल रहा है, स्थिति रोज सुधर रही है. स्थिति न सुधरे इसके लिए पाकिस्तान और उसकी सरजमीं पर चल रहे आतंकी कारखाने सतत कार्यरत है. वह घुसपैठ कराने का हर संभव प्रयास करते है, जिसका भी मुंह तोड़ जबाब हमारे सुरक्षा बल दे रहे हैं. हमारे जवान घाटी में माहौल खराब करने और आतंकवाद को जिंदा रखने के उनके प्रयासों को सफलता पूर्वक विफल कर रहे है. घुसपैठ में आतंकियों को साजो सम्मान उपलब्ध कराने में चीन का भी सहयोग पाकिस्तान को मिलने की सूचना है. उसे भी सफलता पूर्वक नाकाम किया जा रहा है. शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता है जब पाकिस्तान की ओर से कोई न कोई ख़ुराफ़ात हमारे खिलाफ न की जाय. हमारे खिलाफ पाकिस्तान और चीन दो बदन एक जान बने हुए है. इस स्थिति के बावजूद हमारी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में स्थिति सामान्य करने के लिए हर संभव कदम उठाये जा रहे है. इसके बावजूद भी जम्मू-काश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला द्वारा रोज-रोज पाक से बातचीत करने की रट लगाना सर्वथा निंदनीय और आपत्तिजनक है. स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक सबसे ज्यादा समय घाटी में सत्ता पर अब्दुल्ला परिवार का बोलबाला रहा है. वहां जब पाक प्रायोजित आतंक का कहर टूटा और घाटी में आदि काल से निवासी पंडितों को अपना घर छोड़कर अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ा, तब भी यही फारूक सत्ताप्रमुख थे, जो पूरी तरह अलगाववादियों और आतंकवादियों के सामने मजबूर नजर आते थे. यही हाल घाटी के दूसरे सत्ता लोलुप परिवार मुफ्ती का भी रहा है, उसकी अगुवा महबूबा मुफ्ती पर पाकिस्तान का भूत इस कदर सवार था कि सत्ता में रहते व उसके बाहर होते हुए भी पाक के खिलाफ कुछ बोलने की हिम्मत उनमें नहीं दिखती थी और वे हकलाने लगती थी, हाँ इनकी शानो शौकत और भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं थी. क्षेत्रफल की दृष्टि से देश के बड़े सूबों में से एक जम्मू-काश्मीर, जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य के बदौलत दुनिया में धरती के स्वर्ग के रूप में जाना जाता है. उसके महबूबा और अब्दुला जैसे नासूर अभी भी उसे खोखला करने के लिए उसका विशेष दर्जा बहाल करवाना चाहते है. पंडितों के अपने ही देश में शरणार्थी बनने के बाद न जाने कितनी बार एनसी, पीडीपी और कांग्रेस साा में आयी, पर इनकी सरकारें न आतंकवाद पर लगाम लगा सकीं, न ही ये अलगाववादियों की मुश्के बाँध सकीं और न ही उजड़े पंडितों को घाटी में उनके खाली पड़े घरों में बसाने के लिए कुछ कर सकीं. ये लोग घाटी में अमन-चैन बहाल करने में पूरी तरह नाकाम रहे और सिर्फ माल काटते रहे. इन दलों के नेताओं पर अलगाववादियों और आतंकवादियों से साठ-गांठ के आरोप लगते रहे. अब अनुच्छेद 370 हटाने के बाद जम्मू-काश्मीर की सत्ता को अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानने वाले इन जागीरदारों का भविष्य दावं पर है. अब जबकि वहां सब कुछ ठीक हो रहा है तो ये नाखुश लोग निरर्थक होहल्ला मचा रहे है. फारुक अब्दुल्ला उस पाक से बात-चीत की बात कर रहे है, जो हमसे दुश्मनी निभाने की नित-नयी रणनीति बनाता है और षडम्यंत्र रचते रहता है. अपनी राजनैतिक दुकान और लूट जारी रखने के लिए जिस तरह की पाक-परस्ती की अधीरता फारूख जैसे वरिष्ठ नेता दिखा रहे है, वह सर्वथा निंदनीय है. उनकी तोता रटंत भाषा पाक के प्रपेगंड़ा को बल दे सकती है. उन्हें तो पीओके लेने के लिए सुर मिलाना चाहिए, जबकि वह कुछ और ही बक रहे है. आर्टिकल 370 पुन: लागू होगा यह ख्याली पुलाव बनाना बंद कर वह देश की मुख्यधारा के प्रवाह के साथ आगे बढ़ें तो ठीक होगा नहीं तो जब तोतारटंत हद्द से ज्यादा बढती है तो उसका इलाज क्या होता है यह उन्होंने नजरबंदी के दौरान अनुभव किया है. अब जम्मू-काश्मीर में नए युग का आगाज हो चुका है, इसका उन्हें जितना जल्दी भान होगा उनके और उनकी पार्टी के लिए अच्छा होगा.

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