अभिनंदनीय पहल

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने नोएडा में फिल्म सिटी बनाने की घोषणा कर दी है। उत्तर प्रदेश में फिल्म सिटी बनाने की मांग लम्बे समय से उठती रही है। इसके पूर्व भी राज्य की पहले की सरकारों ने इस संदर्भ में वादे किये, परन्तु वे पूरे नहीं हुए। योगी जी घोषणा करने वाले और भूल जाने वाले मुख्यामंत्री नहीं हैं, इसलिए इस बार आस बंधी है और इसका स्वागत भी हो रहा है, इसमें में कोई दो राय नहीं कि जिस तरह की हाय तोबा आज मुबई के फिल्म जगत में मची है, आरोप प्रत्यारोप हो रहे हैं उसमे इस कदम को लेकर भी क्रिया-प्रतिक्रिया सुनने में आ रही है. लोगों को इसे सकारात्मक रूप में लेना चाहिए। कारण यदि देश में जगह जगह फिल्म सिटी बने तो काम का दायरा बढेग़ा और प्रतियोगिता भी बढ़ेगी इससे गुणवता में भी सुधार होगा और रोज़गार बढेग़ा और सरकार के राजस्व में भी वृद्धि होगी. इसमें कोई दो राय नहीं की आज कल की हिंदी फिल्मों में जिस फूहड़ता का नंगा नाच हो रहा है और जनता चाहती है की आड़ में मिर्च मसालों की भरमार करने की प्रवृत्ति हावी है इस मीडिया का जन जागरण और ज्वलंत मुद्दों पर राष्ट्र का ध्यान आकृष्ट करनी की जो कोशिश होती थी वह करीब करीब खत्म हो गयी है। इसकी तुलना में यह काम दक्षिण की फ़िल्मी दुनिया ज्यादा संजीदगी से कर रही है। यही नहीं मराठी सिनेमा और बंगाली सिनेमा का काम भी सराहनीय है, स्तरीय है. वे किसी भी दृष्टिकोण से इनसे पीछे नहीं। यह देशी मिट्टी की सुवास और देश की संस्कार और उसकी विरासत जपने और सहेजने का काम बड़े ही प्रभावी ढंग से कर रहे है। हिंदी और भोजपुरी में जितनी फ़िल्मे बन रही हैं, उन पर जिस तरह से कमाई के नाम पर,जनता की मांग के नाम पर कुछ भी परोसने का काम किया जा रहा है, वह सही नहीं है अनुशासन की बात हो, नयी तकनीक अपनाने की बात हो, कथावस्तु की नूतनता की बात हो और देश का इतिहास संस्कार सहेजने की बात हो इन सब विन्दुओं पर दक्षिण हिंदी फिल्म जगत पर बीस साबित होता है। यही नहीं उनसे कहानी लेने और चुराने तक के आरोप हिंदी फिल्म जगत जगत पर लगते हैं। थोड़ा बहुत मिर्च मसाला का उपयोग समझा जा सकता है। लोग सिनेमा देखने मनोरंजन के लिए जाते हैं, प्रवचन सुनने के लिए नहीं। परन्तु मनोरंजन के साथ साथ देश के ज्वलंत मुद्दों पर जागरण की दृष्टि से जिस तरह अप्रत्यक्ष रू प से ही जो सन्देश दिया जाता था, वह दर्शक के अंतरमन तक सीधा पहुंचता था। अब हिंदी सिनेमा में यह काम लगभग पूरी तरह बंद है उसका स्थान अपराध और अपराधियों के यशोगान अनावश्यक फूहड़ता, अंग प्रदर्शन आदि ने ले लिया है। आज कल अभिनेता और अभिनेत्रियों के आचार विचार और व्यवहार को लेकर, जिस तरह की ख़बरें सुख़िर्यों में हैं, जिस तरह की जांच पड़ताल चल रही है वह भी इस उद्योग के सेहत के लिए ठीक नहीं है। जैसी ख़बरें इस उद्योग के लेकर आ रही हैं इससे प्रतीत होता है कि इसे उद्योग में एक तरह से कुछ लोगों का कुछ परिवारों का एकाधिकार जैसा हो गया है और उन की बपौती जैसा बना गया है। वे इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को अपनी उंगली पर नचाते हैं वो बाहर से आये हुए कलाकारों का कैरियर बनाते या बिगाड़ते हैं। इस अवस्था को, एकाधिकार को तोड़ना बहुत जरूरी है जिससे किसी पर अन्याय न हो, इसलिए और विकल्प जरूरी है और यह तभी होगा, जब इसका विस्तार होगा और योगी जी यही कर रहे हैं। दक्षिण की तरह महाराष्ट्र की तरह बंगाल की तरह अब उत्तर प्रदेश में भी वह बुनियादी ढांचा खड़ा होगा, यह एक अभिनदनीय बात है। उम्मीद है इससे एकाधिकार को तोड़ने में मदद मिलेगी और होनहार कलाकारों को अपना भाग्य आजमाने के लिए और विस्तृत मैदान उपलब्ध होगा।

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