बेसुध समाज, सिसकता और कराहता जीवन

हाथरस की घटना जितनी लोमहर्षक है उतनी ही स्तब्ध करने वाली है. यह किसी भी सभ्य समाज के मुंह पर ऐसा तमाचा है जिसकी गूँज किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के अन्तरमन को हिला सकती है. आदमी कैसे दरिन्दा हो जाता है यह इसकी भयावह बानगी है. नराधमों ने लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार ही नहीं किया बल्कि उसकी जीभ भी काट दी, और उसे दर्द से बिलबिलाती उसके भाग्य पर छोड़ दिया. उन्होंने बलात्कार ही नहीं किया है बल्कि उनका व्यवहार पशुओं से भी गयी-बीती श्रेणी का है. जिस समाज में ऐसे कलंकी पैदा होते हैं उस समाज को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए. जिस तरह की बलात्कार की भीभत्स और भयानक घटनाएँ सामने आ रही है, जिसे सुनकर आदमी आतंकित नहीं होता बल्कि सुन्न हो जाता है और उसका बुद्धि-विवेक काम करना बंद कर देता है. सरकार और कानून व्यवस्था की जिम्मेदार एजेंसियों को सक्रिय, सतर्क और कठोर होने की जरूरत है. लेकिन उसके साथ-साथ समाज को भी अब अपने कान खड़े कर काम पर लगने की जरूरत है. सरकार की ओर से, कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार विभागों की ओर से और न्यायालयों से भी ऐसे मामलों पर कड़ी कारवाई हो रही है. ऐसे अपराधियों को सजा देने के लिए कड़े प्रावधान बने है और ऐसे मामलों को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के सुपुर्द किया जाता है, छेड़छाड़ को लेकर भी कड़े प्रावधान है, बलात्कारी फांसी तक की सजा पा रहे है. अभी कुछ समय पहले तेलंगाना में उन्हें मुठभेड़ में मार दिया गया था, बावजूद इसके ऐसे घिनौने और बुद्धि-विवेक को झकझोरने वाले पाप बंद नहीं हो रहे है. उल्टा उनका तरीका और विद्रूप हो रहा है. मानवता के कलंक ऐसे कुकर्मी ऐसा पाप करते समय उम्र और मर्यादा का भी कोई ख्याल नहीं रख रहे है. क्रूर कर्म के बाद जलाने, मार डालने का, तेज़ाब फेंक देने तक के पातक हमारे समाने आ चुके है, और अब जीभ तक काट लेने का दुषकृत्य जो हम 21वीं सदी में देखने के लिए अभिशप्त है. ऐसी बारदातें तो आदिम युग में भी नहीं सुनी जाती रही होंगी. सरकार अपना काम कर रही है, देश के हर गली-मुहल्ले और नाके पर पुलिस डंडा लेकर नहीं खड़ी रह सकती. जिस तरह की ये वारदातें देश के कोने-कोने में घटित हो रही है वह देश में सामाजिक ताने-बाने और उसके मूल्यों की गिरवाट के बारे में खतरनाक संकेत दे रही है. आखिर क्या कारण है कि हम उस देश में जिस देश में नारी को शक्ति के रूप में पूजा जाता है, उसे सुरक्षा का माहौल नहीं दे पा रहे है. अपने बच्चों में वह संस्कार नहीं दे पा रहे है कि उनके साथ मनुष्यता का व्यवहार हो. कैसे कोई किसी भी महिला या युवती के द्वारा उसका प्रस्ताव ठुकराने पर, उसे या तो जहन्नुम रसीद करने पर, या अंग-भंग कर करने या उस पर एसिड फेंकने पर अमादा हो जाता है? इस पर अब विचार करने की जरूरत है. कानून व्यवस्था की इतनी कमी है कि उसके डंडे की जो धमक होनी चाहिए, वह दिनोदिन खत्म हो रही है. लोगों को लगता है कि कितना भी बड़ा पाप करों, गलती करों, ये संस्थाएं मैनेज हो जायेगी. जिससे वह निर्भीक होकर कुकर्म और असामाजिक कार्य करता है. कोई ऐसा कुकर्म करता है तो इस मनोदशा और मानसिक विकृति का सर्व समाज, सरकार और पुलिस सबको मिलकर अपनी ओर से इमानदार प्रतिकार करना होगा. इसके लिए संयुक्त परिवार का टूटना, आधुनिकता का बढ़ना और पश्चिमी सभ्यता का अन्धानुकरण भी कम जिम्मेदार नहीं है. अब इस बारे में सोचने का समय आ गया है, तभी स्थिति नियंत्रित होगी. बच्चों में और विशेषकर लड़कों में शुरू से ही ऐसे संस्कार डालने की जरूरत है, जो महिलाओं के सम्मान को अपना कर्तव्य समझें. उन्हें सुरक्षा का एहसास हो, यह नहीं कि नाके-नाके पर भेड़िये, टपोरिये तकते बैठे रहे और उनका बाहर निकलना खतरों से भरा हो, और वे घुट-घुट कर सिसक-सिसक कर र्जीवन जीने को बाध्य हों. 

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