शंखनाद बिहार विधानसभा चुनाव का

बिहार विधानसभा चुनाव का शंखनाद हो गया है इसके साथ ही विभिन्न दलों ने अपनी-अपनी राजनीतिक गोटियां बिछाने की और अपने-अपने गठजोड़ को अंतिम रूप देंने का प्रयास तेज कर दिया है. आज एक ओर भाजपा और जदयू गठबंधन है, तो दूसरी ओर एक गठबंधन का नेतृत्व राजद करेगी, इतना तय है. लेकिन उसमें कांग्रेस के अलावा कौन-कौन उनके साथ होगा यह अभी तय नहीं है. कुशवाहा और माझी तेजस्वी के नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाते हुये पहले से ही उनका दामन छोड़ चुके है, जबकि लोजपा जदयू और भाजपा में अभी भी बातचीत जारी है. अभी भी पासवान की लोजपा उसे मिलने वाली सीटों से संतुष्ट नहीं दिखाई दे रही है, तो अभी आगे कुछ और भी नए समीकरण बनने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. जो बिहार की सत्ता के लिए होने वाले इस संग्राम को काफी दिलचस्प बना सकते हैं. शुक्रवार को पप्पू यादव के जाप और भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच जिस तरह की दे-दनादन पटना की सड़कों पर हुई, वह भी ग़ौरतलब है. कारण जिस तरह एक-एक सीट पर कई दावेदार और कई सीटों पर कई कोणीय लड़ाई की काफी संभावना है. बिहार मेें ऐसी प्रतियोगिताओं के मार-पीट में बदल जाने का और दे-दनादन शुरू होने की संभावना ज्यादा रहती है. इसलिए सरकार और चुनाव आयोग को और कानून व्यवस्था की जिम्मेदार एजेंसियों को इसे लेकर ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है, जिससे ऐसी हिंसात्मक घटनाएँ न हों. अभी तक इस चुनाव से लालू का करिश्माई नेतृत्व नदारद है, जो अभी भी जेल में है. अभी तक उन्हें जमानत नहीं मिल पायी है, इसलिए राजद गठबंधन नितीश कुमार और भाजपा गठजोड़ को कोई कड़ी चुनौती देता नहीं प्रतीत होता. लेकिन फिर भी जिस तरह नितीश सरकार की कोरोना प्रबंधन में किरकिरी हुई है, जिस तरह अभी भी बिहार में बाहुबलियों और अपराधियों का बोलबाला है, कानून व्यवस्था की जो दयनीय स्थिति है, जिस तरह उनका बाढ़ प्रबंधन असफल होता जा रहा है और बेरोज़गारी की जो स्थिति है उसके मद्देनजर उन्हें सत्ता में बरकरार रहने के लिए काफी मेहनत करनी होगी, जिसका आभास भी उन्हें है. उन्हें इसका एहसास है इसीलिए वहां के हर पोस्टर में नितीश के साथ प्रधान मंत्री की तस्वीर अनिवार्य रूप से लगाई जा रही है. क्योंकि सबको पता है कि नितीश से ज्यादा प्रधानमंत्री के नाम पर ही गठजोड़ को मत मिलेंगे. प्रधानमंत्री ने भी जिस तरह की सौगातों की बारिश बिहार में की है, और बिहार का काया कल्प करने का अपना संकल्प ही नहीं दुहराया है, बल्कि उस दिशा में ठोस कदम भी उठाया है. नि:संदेह भाजपा जदयू गठजोड़ को इस महत्व पूर्ण समय में ताकत प्रदान कर रहा है. अभी पप्पू यादव जैसे कई किरदार है, जो कई जगह खेल बिगाड़ सकते है. लोजपा को भी पटरी पर लाने का काम अभी बाकी है. संक्षेप में अभी तमाम ऐसी बातें इस चुनाव को लेकर है, जिन्हें भी सामने आना है. उसके बाद ही चित्र साफ़ होगा, जो आगे आने वाले हफ्ते में स्पष्ट होंगी. बिहार में राजनीति का हर खेल खुलकर खेला जाता है और चुनाव भी, प्यार और युद्ध में सब जायज है इस सिद्धांत के अनुसार लड़ा जाता है. देखना यह है कि इस बार वहां क्या-क्या गुल खिलते हैं, और किसकी दीवाली ज़ोरदार होती है, कारण परिणाम दीवाली के चार दिन पहले यानी 10 नवम्बर को आने वाले है. फिलहाल पसंगा सारूढ गठबंधन के पक्ष में झुका दिखता है.

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