पितृपक्ष के बाद नवरात्रि के लिए भक्तों को करना होगा एक माह का इंतज़ार

ॐदेवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्यएव च। 
नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम:॥ 
श्राद्ध का अर्थ अपने देवताओं, पितरों तथा वंश के प्रति श्रद्धा प्रकट करना होता है। पूर्वजों का मुक्ति मार्ग की ओर अग्रसर होना ही पितृ ऋण से मुक्ति दिलाता है। पितृपक्ष के दौरान वैदिक परंपरा के अनुसार ब्रह्म वैवर्त पुराण में यह निर्देश है कि इस संसार में आकर जो सद्गृहस्थ अपने पितरों को श्रद्धा पूर्वक पितृपक्ष के दौरान पिंडदान, तिलांजलि और ब्राह्मणों को भोजन कराते है, उनको इस जीवन में सभी सांसारिक सुख और भोग प्राप्त होते हैं। पितृपक्ष को महालय या कनागत भी कहा जाता है। हिन्दू धर्म मान्यता अनुसार सूर्य के कन्याराशि में आने पर पितर परलोक से उतर कर कुछ समय के लिए पृथ्वी पर अपने पुत्र- पौत्रों के यहां आते हैं। पितृ्पक्ष अर्थात श्राद्धपक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्चिन कृ्ष्ण अमावस्या तक रहते है. इस प्रकार प्रत्येक साल में पितृ पक्ष के 16 दिन विशेष रुप से व्यक्ति के पूर्वजों को समर्पित रहते हैं। इस वर्ष श्राद्ध पक्ष 1 सितंबर से शुरु हो रहे हैं जो 17 सितंबर तक रहेंगे। 

हालांकि इस साल भक्तों को पितृपक्ष के बाद एक महीने तक नवरात्रि मनाने के लिए इंतजार करना होगा। अब ऐसे में आपके मन में भी यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि इस साल ऐसा क्या हो गया कि नवरात्रि के लिए महीने भर का इंतजार करना पड़ेगा। तो आइए इस बारे में जानते हैं ज्योतिषाचार्य पण्डित अतुल शास्त्री जी से। 
इस बारे में विस्तार में बताते हुए पण्डित जी कहते हैं कि आमतौर पर पितृ पक्ष समाप्त होने के तुरंत बाद नवरात्रि शुरू हो जाती है लेकिन इस बार माँ दुर्गा के भक्तों को नवरात्रि के लिए एक महीने का इंतजार करना होगा। इस बार नवरात्रि पितृ पक्ष खत्म होने के तुरंत बाद नहीं बल्कि एक महीने बाद शुरू होगी। और ऐसा हो रहा है 165 साल बाद बन रहे अद्भुत संयोग के कारण। जी हाँ इस वर्ष अश्विन मास में मलमास लगेगा। मलमास को अधिक मास भी कहते हैं जो इस वर्ष 18 सितंबर से लेकर 16 अक्टूबर तक रहेगा। इसी अधिकमास के चलते श्राद्ध और नवरात्रि के बीच मलमास लगेगा। इसी वजह से एक महीने का अंतर पितृ पक्ष और नवरात्रि के बीच हो रहा है। ये अद्भुत संयोग करीब 165 साल बाद आने जा रहा है जो ज्योतिषीय जगत के अनुसार किसी चमत्कार से कम नहीं। 
ज्योतिषाचार्य पण्डित अतुल शास्त्री जी ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए ज्योतिषीय गणना के अनुसार मलमास या अधिक मास की विस्तृत जानकारी देते बताया, 'एक सूर्यवर्ष की अवधि 365 दिन और 6 घंटे की होती है जबकि चंद्र वर्ष की अवधि 354 दिन होती है। गणना करने पर सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच करीब 11 दिनों का अंतर होता है। इन दोनों के बीच 11 दिनों का यह अंतर हर तीन साल में करीब एक के बराबर होता है। इसी एक महीने के अंतर को खत्म करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अतिरिक्त या अधिक आता है। इसी अतिरिक्त चंद्र मास को अधिमास या मलमास कहते हैं।' 
मलमास के अलावा श्राद्ध पक्ष की भी विस्तृत जानकारी देते हुए ज्योतिषाचार्य पण्डित अतुल शास्त्री ने आगे कहा, ''किसी वस्तु के गोलाकर रूप को पिंड कहा जाता है। प्रतीकात्मक रूप में शरीर को भी पिंड कहा जाता है। पिंडदान के समय मृतक के निमित्त अर्पित किए जाने वाले पदार्थ की बनाई गई गोलाकृति पिंड होती है। इसे जौ या चावल के आटे को गूंथकर बनाया जाता है। श्राद्ध की मुख्य विधि में मुख्य रूप से तीन कार्य होते हैं, पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन। दक्षिणाविमुख होकर आचमन कर अपने जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर चावल, गाय के दूध, घी, शक्कर एवं शहद को मिलाकर बने पिंडों को श्रद्धा भाव के साथ अपने पितरों को अर्पित करना पिंडदान कहलाता है। जल में काले तिल, जौ, कुशा एवं सफेद फूल मिलाकर उस जल से विधिपूर्वक तर्पण किया जाता। कहते है कि इससे पितर तृप्त होते हैं। इसके बाद श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन कराया जाता है।'' 
शास्त्रों में पितरों का स्थान बहुत ऊंचा बताया गया है। उन्हें चंद्रमा से भी दूर और देवताओं से भी ऊंचे स्थान पर रहने वाला बताया गया है। पितरों की श्रेणी में मृत पूर्वजों, माता, पिता, दादा, दादी, नाना, नानी सहित सभी पूर्वज शामिल हैं। व्यापक दृष्टि से मृत गुरु और आचार्य भी पितरों के श्रेणी में आते हैं। श्राद्ध के महत्व के बारे में कई प्राचीन ग्रंथों तथा पुराणों में वर्णन मिलता है। पितरों को आहार तथा अपनी श्रद्धा पहुँचाने का एकमात्र साधन श्राद्ध है। शास्त्रों के अनुसार जिन व्यक्तियों का श्राद्ध मनाया जाता है, उनके नाम तथा गोत्र का उच्चारण करके मंत्रों द्वारा अन्न आदि उन्हें समर्पित किया जाता है, वह उन्हें विभिन्न रुपों में प्राप्त होता है। जैसे यदि मृतक व्यक्ति को अपने कर्मों के अनुसार देव योनि मिलती है तो श्राद्ध के दिन ब्राह्मण को खिलाया गया भोजन उन्हें अमृत रुप में प्राप्त होता है। यदि पितर गन्धर्व लोक में है तो उन्हें भोजन की प्राप्ति भोग्य रुप में होती है। पशु योनि में है तो तृण रुप में, सर्प योनि में होने पर वायु रुप में, यक्ष रुप में होने पर पेय रुप में, दानव योनि में होने पर माँस रुप में, प्रेत योनि में होने पर रक्त रुप में तथा मनुष्य योनि होने पर अन्न के रुप में भोजन की प्राप्ति होती है। 

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