दूध का दूध और पानी का पानी होगा

सूशांत सिंह राजपूत प्रकरण में जांच के दौरान जिस तरह ड्रग एंगल सामने आया और रोज इसमें बड़े-बड़े नामों के शामिल होने की बात सुर्खियाँ बना रही है, रिया सहित कई लोग सलाख़ों के पीछे है, अभी भी जांच पड़ताल और छानबीन जारी है. इसमें फिल्म जगत की छवि को लेकर सपा सांसद जया बच्चन द्वारा संसद में दिए गए वक्तव्य के बाद सांसद रविकिशन द्वारा अपनी भूमिका पर अडिग रहने और हेमा मालिनी सहित कई अभिनेत्रियों के जया के समर्थन में और फिल्म जगत के समर्थन में मुखर होने से एक नयी बहस शुरू हो गयी है. इस बात से कोई असहमत नहीं होगा कि जिस पतरी में खाते हैं उसी में छेद नहीं करना चाहिए. देश और दूनिया का मनोरंजन करने में भारतीय सिनेमा जगत का एक बडा नाम है, वह देश के लोगों को अच्छा रोजगार भी देता है. साथ ही देश और राज्य को कर के माध्यम से काफी राजस्व मिलता है. देश हित के कई कामों में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है. आपदा काल में लोगों की मदद के लिए वे बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते है. इस कोरोना काल में भी कई सितारों का योगदान सराहनीय, और देशवासियों का माथा ऊंचा करने वाला रहा है. यह सब अच्छी बाते फिल्म जगत की है. जिसे जया बच्चन ने अपने वक्तव्य में उठायी है. इन सभी बातों से किसी का कोई विरोध नहीं हो सकता, परन्तु उसके साथ ही वहां परिवारवाद का होना, नये कलाकारों का शोषण होना, नामचीन अभिनेताओं का देश-द्रोही और अलगाववादी ताकतों और देश के कुख्यात अपराधियों के साथ फोटो होना, वहां भी अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक वाद की गन्दी राजनीति का होना, और अभी जिस तरह ड्रग्स को लेकर रोज-रोज नयी-नयी सुर्खियां बन रही है, आदि ऐसी बातें है जो किसी भी संस्थान या उद्योग जगत के लिए चाहे वह फ़िल्मी हो या कोई और, शोभनीय नहीं कहीं जा सकती. ऐसे आरोप कोई सिरफिरा नहीं बल्कि देश की विख्यात और कुशल एजेंसियां लगा रही हैं, और बातें सुख़िर्यों में आ रही है. हो सकता है कि इसको लेकर मीडिया के प्रस्तुतीकरण में थोडा-बहुत अतिरेक हो, परन्तु इतना तो जया जी भी जानती हैं कि धुवां वहीं होता है जहां आग होती है. जिस तरह वह फिल्म जगत के हर योगदान को गिना रही है, वैसे ही उन्हें और उनके समर्थन करने वालों को यह भी कहना चाहिए कि यदि वहां ऐसा कुछ गलत हो रहा है, जैसा आज कल रोज उजागर है. इसमें कई बातें कदम देश हित में भी नहीं लगती, तो उस पर भी जांच की जरूरत है, व ऐसे तत्वों पर सख्त कर्रवाई की बात करनी चाहिये थी. कारण ऐसे कामो और आरोपों से फिल्म जगत का नाम और छवि दोनों खराब हो रही है. जिसे लेकर जया जैसे वरिष्ठों को ज्यादा चिंता होनी चाहिये. उन्होंने जिस तरह फिल्ा जगत की अच्छाई बताने से परहेज नहीं किया वैसे ही उन्हें यह भी कहना चाहिए कि यदि गलत हो रहा है, तो उस पर भी सख्त कारवाई होनी चाहिये. जबकि रविकिशन और अन्य तमाम लोग यही मांग कर रहे है. रविकिशन ने जया की तरह सिर्फ अच्छा ही नहीं देखा, बल्कि जो गलत हो रहा है उसको भी दूर करना चाहती है. देश की तीन नामचीन एजेंसियां अपना काम कर रही है और चाहे वह सुशांत की मौत का मामला हो, पैसों की हेराफेरी या ड्रग्स का कारोबार हो, सबका 'दूध का दूध और पानी का पानी' होकर रहेगा. तब तक सब्र रखने की जरूरत है. निरर्थक बहस से कुछ हासिल होने वाला नहीं है. एक साफ़-सुथरा व शुद्ध व्यावसायिक फिल्म जगत सबके हित में है. यह कि रविकिशन भी रोजी-रोटी रही है वे सब यही चाहते है. यदि खाने की पत्तल में मिट्टी लगी हों, तो उसे साफ किया जाय, इसमे छवि बिगाड़ने की बात कहां से आ गयी.

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