अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद में छोटे दल

मोदी युग के आगाज के साथ ही 2014 से जिस तरह जाति, क्षेत्र व परिवारवाद को आधार बनाकर राजनीति करने वाले दल हाशिये पर गए हैं, उससे ऐसा लगने लगा है कि अब राजनीति में छोटे दलों की स्थिति कमजोर हो रही है. हां! कांग्रेस जैसे राष्ट्रव्यापी दल का क्षरण जरूर चिंता की बात है, लेकिन उसके लिए दूसरा कोई नहीं, बल्कि वह खुद ही जिम्मेदार है. कारण, अपनी अखिल भारतीय उपस्थिति और वजूद को सब कुछ मान कर उसमें जो अजेयता का दंभ आया, उसी के चलते उसके द्वारा तमाम क्षेत्रीय आवश्यकताओं और स्पृहाओं की अनदेखी की गयी. इन्हीं कारणों से वंचित लोगों में जो अंसतोष उभरा उसकी भरपाई करने के लिए ऐसे अवसरवादी क्षेत्रीय शक्तियां आगे आयीं, जिन्होंने उस अंसतोष को भुनाया. उस पर जातिवादी, क्षेत्रवादी, धर्मवादी और परिवारवादी मुलम्मा चढ़ाया और उचित अनुचित की परवाह न कर कानून की विसंगतियों का फायदा उठाकर ऐसे जोड़-तोड़ और गठजोड़ किये, जो सही नहीं कहे जा सकते और ऐसे लोग कई राज्यों के भाग्य विधाता बन गए. कांग्रेस को जब तक इसका एहसास होता, तब तक लम्बे समय तक उसके शक्तिशाली गढ़ रहे पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, उत्तरप्रदेश और अन्य राज्य उसकी पहुंच से काफी दूर जा चुके थे. जिसमें से कई राज्य ऐसे हैं जहां कई दशक से कांग्रेस सताा के इर्द-गिर्द छोड़िये विपक्ष में भी सम्मानजनक स्थिति में नहीं है. कई दशकों से कांग्रेस चाह कर भी इन

राज्यों में कुछ भी नहीं कर पा रही है, कारण उसकी ही गलतियों के चलते जिन चीजों की उसने अनदेखी की उन्हें ही बाद में बदलकर नेताओं ने उसका वोट बैंक हड़प लिया और आज उसके हाथ में इन राज्यों में कुछ नहीं है. मोदी युग ने इन वादों को बड़े पैमाने पर विध्वंश किया है, परन्तु बिहार अभी भी हर वाद बना हुआ है. कारण अभी भी वहां भारतीय सियासत के हर अच्छे बुरे रंग कमोबेश अपना अस्तित्व रखते हैं. पिछले चुनाव में भी उससे मुकाबले में भाजपा का पलड़ा देश के अन्य भागों की तरह बिहार में प्रभावी नहीं रहा. इस बार भी लड़ाई भले ही नितीश और भाजपा नीत गठबन्धन और राजद-कांग्रेस नीत गठबन्धन में है. वहां राजनीतिक पार्टियों के हर किरदार चाहे वह वामदल हो या ओवैसी, लोजपा हो या और कोई पार्टी, सहनी या माझी का दल, सब या तो दोनों गठबंधनों से किसी के साथ मिलकर, या अलग-अलग मैदान में है. देखना यह है कि इस बार बिहार क्या सन्देश देता है? ऐसे दलों की जो देश में भ्रष्टाचार और भाई भतीजवाद की गंगा बहाने के लिए जाने जाते है, जिन्होंने जातिवाद को एक नया स्वरूप अपनी राजनीति से दिया है, और जिनका पूरे देश में क्षरण हो रहा है इस बार कुछ करामत दिखा पाते है या नहीं. कारण ये अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है. इनके अतीत के जगंलराज ने बिहार की क्या दशा बनाई थी, कानून व्यवस्था की क्या दयनीय स्थिति थी, अपराधी कैसे सफेदपोश बनकर अपना नित-नया क्रूर करतब दिखाते थे, यह सब राजद को याद नहीं है, और न ही सपा बसपा को याद है. इनके नेतृत्व में ये राज्य बीमारू उपाधि से विभूषित थे. खुलेआम दागदार लोगों को टिकट दिया जा रहा है और विकास व रोजगार की गंगा बहाने की बात भी की जा रही है. तो देखना यह है कि मोदी युग के विकास की आंधी से प्रकम्पित राजनीति का यह वर्ग जिसके लिए किसी भी तरह से सताा पाकर अपना और अपनों का भला करना है. इस बार बिहार से भूसपाट होता है कि नहीं, कारण यह उनके द्वारा अपना अस्तित्व बचाये रखने की निर्णायक कोशिश है. यदि इस बार इनका नितीश और भाजपा के हाथों पराभव हुआ तो बिहार ही नहीं देश भर में इनका अस्तित्व बचना मुश्किल होगा.


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