अकेली पड़ी लोजपा

बिहार विधानसभा के दो मुख्य गठबंधनों की तस्वीर मंगलवार को जदयू और भाजपा गठबंधन की सीटों के एलान के साथ साफ हो गयी है. 243 सदस्यीय बिहार विधान सभा के लिए हो रहे चुनाव के लिए राजद, कांग्रेस और अन्य वामदलों के गठबंधन का मुकाबला, भाजपा-जदयू गठबंधन से होने जा रहा है, जिसमे कांग्रेस 70 सीटों पर लड़ रही है बाकी पर कुछ सीटें वाम दलों को गई है और अधिकांश सीटों पर राजद लड़ रही है. जहा तक भाजपा और जदयू का सवाल है वे क्रमश: 121 और 122 सीटों लढ़ रही है. भाजपा अपने कोटे की 121 सीटों में से 9 सीटें मुकेश सहनी की पार्टी को दे रही है, जबकि जदयू अपनी सीटों में से 7 सीटें पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी को दे रही है. बिहार में पहले चरण का मतदान 28 अक्टूबर को होने वाला है, और अब जबकि राजनैतिक शतरंज की बिसातें बैठ गयी हैं, प्रचार अपने जोर पर आएगा. इसमे चिराग पासवान का अड़ियल रवैया ख़ारिज हो गया है, और उनकी 143 सीटों की मांग ख़ारिज हो गयी है. जिस तरह आज भाजपा ने संकेत दिए है कि यदि वे भाजपा-जदयू गठबंधन में नहीं है, तो उन्हें भाजपा नेताओं के नाम या फोटो और झंडा उठाने की इजाज़त नहीं होगी. स्पष्ट है कि उनकी भाजपा से दोस्ती और नितीश से लड़ाई वाली रणनीति भी विफल है. लेकिन दोनों गठबंधनों की समस्या बढ़ गयी है, कारण अब लोजपा और अन्य ऐसे दल मसलन शिवसेना और कुशवाहा की पार्टी जिसका बसपा से गंठजोड़ है और मौलना ओवैसी, ये सब वोट कटुवा की भूमिका निभायेंगे. देखना यह है कि आखिर अंतत: 10 नवम्बर को जो परिणाम आयेगा उसमें बिहार का मतदाता किसे बिहार का भाग्य विधाता अगले पांच वर्षों के लिए चुनता है. फिलहाल आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला जोर पर है और एक-दूसरे पर हत्या तक के आरोप लगाये जा रहे है. कुल मिलाकर बिहार के इस चुनाव में विगत के चुनावों की तरह बिहार का हर चुनावी रंग जिसमे बाहुबलियों की ललकार से लेकर जाति-धर्म और मजहब का हर खेल हमेशा की तरह खेला जाने वाला है, ऐसे आसार अभी से नजर आ रहे हैं. इसके मद्देनजर सरकार और चुनाव आयोग दोनों चौकस है और सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद करने से लेकर वह हर कदम उठाये जा रहे है, जिससे चुनाव शांति और सुव्यवस्थित माहौल में संपन्न हों.
फिलहाल जो संकेत मिल रहे हैं उसमें सारूढ़ गठबंधन का पलड़ा विपक्ष की अपेक्षा ज्यादा व्यवस्थित नजर आ रहा है. उनके पास नितीश कुमार और सुशील मोदी जैसे नेता है, और प्रधानमंत्री की लोकप्रियता और उनके द्वारा बिहार के विकास के लिए उठाये गए कदमों का भी अच्छा प्रतिसाद भाजपा और जदयू गंठजोड़ को मिलने का पूरा विश्वास इनके नेताओं को है. जबकि विपक्षी राजद नीत खेमा अभी भी कोई सर्वमान्य विकल्प न नीतिगत रूप से और न हीं नेतृत्व के रूप में जनता के सामाने रख सका है. तेजस्वी यादव को नेता जरूर मान लिया गया है परंतु जिस तरह माझी, सहनी और उसके पहले कुशवाहा उन्हें छोड़ गए इससे लगता है कि जिस तरह के परिपक्व नेतृत्व की उनसे दरकार थी वैसा वे नहीं कर पाये. वोटकटुवा दल, सब के सब पिछड़े या दलित मतदाताओं के लिए प्रतियोगिता करते नजर आ रहे है, जो राजद का एक जमाने में मत बैंक हुआ करता था. तो इससे नुकसान राजद खेमे का ही होना है, जबकि भाजपा का अपना मत बैंक उसके साथ खड़ा है, और नितीश की भी स्थिति तेजस्वी की तुलना में बहुत अच्छी है. सहनी और मांझी को अपने साथ लेकर भाजपा और जदयू ने अपना अस्तित्व मजबूत किया है. कुल मिलाकर स्थिति काफी रोचक हो गयी है. ऐसे में सबसे घाटे में रामविलास पासवान की लोजपा ही नजर आ रही है, जिसे अपनी क्षमता को लेकर गलतफमी ने उसे आज अकेला छोड़ दिया है. उन्होंने अपनी ऐसी हालत खुद ही बना ली है कि अब वह अकेले थपेड़े खाने को मजबूर है.

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