बापू के सपनों का भारत...

आज पूरा देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती मना रहा है. देश को अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होने जो अप्रतिम संघर्ष किया, जिसका आज भी देश और दुनिया में गुणगान होता है. आज भी दुनिया के अनगिनत शिक्षण संस्थानों में उनके सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह और असहयोग के सिद्धांतो पर शिक्षण और शोध हो रहा है. यह किसी भी भारतीय के लिए गर्व की बात है. बापू की दृष्टि सिर्फ अंग्रेजी शासन से आज़ादी दिलाने तक ही सीमित नहीं थी, वह देश के हर नागरिक की चाहे वह ग्रामवासी हों या शहर वासी सबकी हर तरह के उत्पीड़न और अत्याचारों से मुक्ति चाहते थे. जन्म के नाते किसी के साथ किसी भी तरह का भेदभाव न हो और कहीं भी ऊंच-नीच का कोई सवाल न हो. वह समाज में बराबरी का ऐसा माहौल चाहते थे, जहाँ सबको उसकी योग्यता और पात्रता के अनुसार स्वविकास के अवसर उपलब्ध हों. देश की बालिकाओं और महिलाओं के प्रति भी उनका स्पष्ट दृष्टिकोण था. वे उनकी उन सनातन मान्यताओं, अवधारणाओं और कुरीतियों से मुक्ति चाहते थे, जो बेड़ी बनकर उनके शारीरिक और मानसिक विकास में बाधा थी और जिसके चलते वे देश के विकास में अपनी सही भूमिका निभा सकने में असमर्थ हैं. देश को आजाद हुए सात दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है, देश की आजदी से लेकर अब तक की सभी सरकारें अपने आपको गांधीवादी बताते नहीं थकती. उनकी पुण्यतिथि और जयन्ती बड़ी शिद्दत से मनाई जाती है. क्या हम उनके सपनो के अनुरूप भारत बना सके है? अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि यदि केवल बापू को सामने रखकर पूर्व सरकारे काम करती तो भारत के गावों की इतनी दुर्दशा नहीं होती, जितनी देखी जा रही है. वे जातिवाद, धर्मवाद और दलितवाद से मुक्त समाज चाहते थे. परंतु आज चुनाव के समय इनका उपयोग नेताओं का सबसे बड़ा हथियार है. आरक्षण जिसकी संकल्पना अल्पकाल के लिए इसलिए की गयी थी कि अतीत में सामजिक मान्यताओं और व्यवस्थाओं के चलते जो वर्ग शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में पीछे रह गया है, वह बराबरी पर आ जाय. आज वह इतना बड़ा अस्त्र बन गया है कि कोई दल उसके बारे में बोलने से भी ड़रता है. कारण इसके चलते बने निहित स्वार्थी तत्व इसे बरकार रख सत्ता की मलाई काटना चाहते है, और महिलाओं का तो पूछो ही मत, आज भी इस वर्ग के ऊपर अत्याचारों की भरमार है. शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता है जब इन पर होने वाले लोमहर्षक अत्याचार सुर्खियाँ न बनते हों. अभी भी आज जब हम बापू की जयंती मान रहे है तो हाथरस से लेकर बुलंद शहर तक, बलरामपुर से लेकर भदोही तक के बलात्कार और उसके बाद इस तरह मारपीट की, जिसमें लड़की दम तोड़ दे, ऐसी घटनाएं देश को झकझोर रही है. जिसपर निर्लज्ज राजनीतक दल सर पकड़ बैठकर सोचने की बजाय राजनीति कर रही है. सपा-बसपा और कांग्रेस सब इसे लेकर समाज को सुधारने का, दोषियों को सजा दिलाने की मांग करने, और ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने को आन्दोलन नहीं कर रहे है, बल्कि दलित मत कैसे उनके पाले में आ जाए या बने रहें. इसी तामझाम में सड़क पर उतर रहे हैं और बयान दे रहे है. उनकी निगाह सिर्फ और सिर्फ ऐसा कर दलित वोट पाने की है. इन्हें नहीं लगता कि इससे न इनका भला होगा और न ही देश का, और न ही बापू की आत्मा को शांति मिलेगी. तो आइये इस अवसर पर कुछ ऐसा करने का संकल्प लें, जिससे बापू जिस तरह का आजाद भारत देखना चाहते थे, और जिसके लिए उन्होंने आजीवन संघर्ष किया, और जिसका उनका नाम लेकर राजनीति करनेवाले नेता और देश की गैर जिम्मेदार नोकरशाहो ने बंटाधार कर दिया हैं वह बदले. यह लज्जा की बात है कि एक युवती की जान और अस्मिता से खिलवाड़ में राजनीतिक गोटियां बिठाने का अस्त्र बन रहा है. इस शर्मनाक स्थिति से देश उबरे और बापू के सपनो के अनुरूप भारत बनाएं जहां असली अर्थों में रामराज हो. यह हम सबकी प्राथमिकता होनी चाहिए. 

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