सिर्फ कंक्रीट के जंगल पर्याप्त नहीं

 देश में कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि का सिलसिला चलता ही रहता है. इस बार देश में बारिश काफी अच्छी हुई यह सुखद बात है, लेकिन इस दौरान बाढ़ से गाँव और शहरों में पानी भर जाने से जो नुकसान हुआ है, जो लोगों को तकलीफें हुई है उसका क्या? बारिश का होना न होना प्रकृति के अधीन है, उस पर हमारा कोई जोर नहीं है, लेकिन इससे नुकसान रोकने के लिए जो मानव निर्मित व्यवस्थाएं होनी चाहिए क्या वह सही और पर्याप्त है? इस बारे में सोचने पर या दृष्टिपात करने पर बहुत ही भयावह स्थिति सामने आती है. पहले लोग बाढ़ की विभीषिका का ज्यादातर दर्शन दूर दराज के ग्रामीण इलाकों में करते थे, परन्तु आज तो देश के मुंबई, पुणे, हैदराबाद जैसे नामचीन शहरों का जो नजारा दिख रहा है, वह जितना डरावना है उतना ही आंखे खोलने वाला है, कि कैसे हमारे टाउन प्लानर्स व अन्य जिम्मेदार एजेंसियों, नेता-नौकरशाह और ठेकेदारों के निहित स्वार्थी अपवित्र गठजोड़ ने पूरे देश के शहरों को कंक्रीट के जंगल में तब्दील कर दिया है. वहां कैसे सही तरीके से जल निकासी होगी, कैसे आवागमन होगा इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया. देश के अधिकांश महानगर चाहे वह प्रथम या द्वितीय श्रेणी के हों सबका मूलभूत ढांचा चरमरा रहा है, उस पर शोकांतिका यह कि इन शहरों में ब्रिटिश कालीन निर्माण तो अब भी काम कर रहे है, जबकि हमारे नए-नए बने पुल उद्घाटन के पूर्व या तुरतं बाद ढह जा रहे है. जिसका असर दो तरह से हो रहा है, पहला लोगों को अनायास ही परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, उससे अन्य आर्थिक क्रियाकलाप भी प्रभावित होता है. इससे बचने के लिए दूरगामी सोच और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर मौजूदा ढांचे का विस्तार करना होगा. नयी बस्तियों को बसाने के पहले भी इसी सोच के साथ आगे बढ़ना होगा तभी बात बनेगी, नही तो ऐसा ही जल प्लावन का नजारा जैसा कि कुछ दिन पहले मुंबई, बेंगलुरु और देश के अन्य भागों में दिख रहा था, और आज पुणे व हैदराबाद में दिख रहा है, इसकी पुनरावृत्ति होती रहेगी. दुनिया की नजरों में हम तमाशा बनते रहेंगे. हमसे तो अच्छे हमारे पूर्वज थे जो किसी भी नए निर्माण के पहले उन सभी बातों को लेकर पूरा एहतियात बरतते थे, जो एक स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी है. मसलन घर में शुद्ध हवा, पानी, प्रकाश, जल व मल नि:सारण की पूरी व्यवस्था यथोचित रूप से करते थे. वृक्षारोपण, जल संचयन की उनकी अपनी सोची-समझी रणनीति थी, जो पर्यावरण के अनुकूल थी. हमने आधुनिकता के मद में उन सब बातों की अनदेखी की, और विकसित होने के दंभ में कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिये. उसका असर है कि भारी तो छोड़िये सामान्य बारिश भी हमें ऐसे शहरी जंगलों में जलप्रलय का नजारा दिखा देती है. गर्मी के मौसम में ये आधुनिक निर्माण आग की भट्ठी में बदल जाते है. यह कैसी दु:खद स्थिति है कि हम अपना परिसर साफ़ रखें, इसके लिए हमें पुरस्कार दिया जा रहा है और लोगों को शिक्षा देनी पड़ती है कि आप पेड़ लगाओ, जल बचाओं, वायु प्रदूषण व ध्वनि प्रदूषण न करो. आखिर कब तक सरकार और संवेदनशील लोग हमें अपने कर्तव्यों की याद दिलाते रहेंगे? आवश्यक है कि सरकार, प्रशासन और जनता सब जागें और इन कंक्रीट के जंगलों में ऐसे बदलाव करें कि लोग इसमें सुख शांति से रह सकें व अपना काम कर सकें. जल जमाव और ट्रैफिक जाम झेलते हुए और अशुद्ध हवा या पानी पीते हुए ही अपना जीवन गुज़ारने को अभिशप्त न हों. हमें इस स्थिति से निकलना होगा. सिर्फ कंक्रीट के जंगल से काम नहीं चलेगा, और भी बहुत कुछ करना जरूरी है 

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