आखिर कब तक दुनिया तमाशबीन बनी रहेगी

 एक और कायराना हमला

 फ्रंस में अतिवादियों द्वारा एक शिक्षक की गला काट कर हत्या किये जाने की भयंकर घटना की आग अभी ठंडी ही नही हुई थी, कि एक और आतंकी हमले में तीन लोगों को फ्रांस के शहर नीस के एक गिरजाघर में बड़ी ही निर्ममता पूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया. फ्रांस पिछले लम्बे समय से इस्लामिक कट्टरपंथियों से लोहा ले रहा है, और इसकी भारी कीमत भी चुका रहा है. उसके निर्दोष नागरिक इन कायराना और क्रूर हमलों का सामना करते हुए, दुनिया में मुस्लिम चाहे जहाँ रहें अपने तरीके से रहेंगे, और उस पर या उनकी मान्यताओं पर कोई सवाल खड़ा करता है तो उसे जीने नहीं देंगे को अस्वीकार कर रहे है और उनसे मोर्चा ले रहे है. जिसका परिणाम है कि उनके खिलाफ मुस्लिम देशों में विरोध शुरू हो गया है और उनके उत्पादों व लोगों को निशाना बनाया जा रहा है. स्वाभाविक है कि इन हमलों की कायराना करतूतों की दुनिया भर में निंदा हो रही है, लेकिन यह काफी नहीं है. जिस तरह हमलों का दायरा बढ़ते जा रहा है और उसकी निर्ममता व क्रूरता में वृद्धि हो रही है, आदिम युगीन पाशविक तौर तरीकों को अपनाया जा रहा है, चाकू से गोदा जा रहा है, गला काटा जा रहा है, साथ ही जिस तरह कुछ देश अपने अपने कारणों से ऐसा बोल या कर रहे है, जिससे समाज विरोधी तत्वों के आत्मबल में वृद्धि होती है और वह बड़ा कुकर्म करने के लिए उद्यत होता है, पर रोक लगानी होगी, यह निंदा करने से नहीं रुकेगा. यह इस खुशफहमी से नहीं जायगा कि हमारा घर सुरक्षित है, कारण यह ऐसी आग है जो दुनिया का सूरमा बनने का दंभ रखने वाले अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस सहित अधिकांश विकसित देशों को अपनी हैवानियत का स्वाद चखा चुकी है. ये लोग आगे भी दुनिया को अपने आगोश में लेने के लिए लगातार लगे हुए है, यह कितने ढीठ है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पुलवामा के बाद भारत की जबर्दस्त प्रतिक्रिया और दो-दो सर्जिकल स्ट्राइक झेलने के बाद भी और एफ़टीएफ़ की काली सूची में जाने की तलवार सर पर लटकी होने के बाद भी पाक पुलवामा के कायराना और कुत्सित हमले को अपनी उपलब्धि बता रहा है. जिस फ्रांस के निर्दोष नागरिक कट्टरपंथियों द्वारा हलाल किये जा रहे है, उसी फ्रांस का ये दुनिया के दुश्मन बहिष्कार कर रहे है. ऐसे हाल में अब इस प्रवरुत्ति के विरोध में खड़ी दुनिया को यह तय करना होगा कि उसे यह सब ऐसे होते देखना है या कुछ करना है. यह कुछ आतंक वादियों को मारने से नहीं खत्म होनेवाला. यदि ऐसा होता तो अब तक न जाने कितने आतंकी मारे जा चुके है, लेकिन उसके बाद भी इनके द्वारा अंजाम दी जा रही क्रूर वारदातों की बारंबारता में कमी आने की बजाय वे बढ़ रही है. कारण मौत के इन सौदागरों के संकल्पनाकर, उसके निर्देशक और उसे अपनी कूटनीति का अंग मानने वाले राष्ट्रप्रमुख और राष्ट्र इसे बढ़ावा देंने और इन्हें साधन सुविधा उपलब्ध कराने से बाज नहीं आ रहे है. आवश्यकता है ऐसी सोंच के संकल्पनाकर, उसके समर्थक और प्रायोजकों तथा उस पर अमलीजामा पहनने वाले हैवानों सब पर एक साथ निर्णायक और सतत प्रहार हो. यह एक देश अकेले नहीं कर सकता. कारण इनका विस्तार अब विश्वव्यापी स्वरुप अख्तियार कर चुका है. यह मानवता को सिहारने वाले और उसे भयांक्रांत करनेवाले अपने काले कारनामों से किसी न किसी देश को रोज दहलाते रहते है, और पाकिस्तान की तरह खुलेआम अपना पातक स्वीकार भी करते रहते है. अब दुनिया को यह तय करना है कि मौत का यह नंगा नाच जो एक धर्म विशेष के कट्टरपंथियों द्वारा एक दैनिक कार्यक्रम की तरह दुनिया में कहीं न कहीं बड़े ही भयावह और मर्मान्तक तरीके से प्रदर्शित किया जाता है, आखिर कब तक चलेगा? उस पर लगाम लगेगी भी या नहीं, लोग हलाल होते रहेंगे और दुनिया के राष्ट्र इनकी निंदा कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मानते रहेंगे. 


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