बीती ताहि बिसारि दे...

करीब तीन दशक के इंतजार के बाद बुधवार को बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में फैसला आ गया है. लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया है. स्वाभाविक है किसी भी फैसले से दोनो पक्ष सहमत नहीं होते, किसी को अच्छा लगता है किसी को नहीं. वैसी ही प्रतिक्रिया इस फैसले के बाद भी आ रही है. कुछ लोग असंतुष्ट होने के लिए ही होते है, मौलाना असुुद्दीन ओवैसी और जफरयाब जिलानी इसी श्रेणी में आते है. इन्होने यह तय कर लिया है कि इन्हें वक्त के साथ नहीं चलना है, और पुराने घावों को कुरेदते ही रहना है, कारण इसी की ये रोटी खाते है, तो चंद एक स्वयम्भू और स्वयं घोषित अल्पसंख्यक समाज के प्रवक्ताओं को छोड़ दें तो ज्यादातर लोग, चाहे वह बहुसंख्यक समुदाय के हों या अल्पसंख्यक समुदाय के हों, उन्होंने इस परिणाम से राहत की साँस की ली है. कुछ लोग इस तरह के मुद्दों को अपनी राजनीति के लिए जिलाए रखना चाहते है, लेकिन वे खुद ही हासिये पर हो जायेंगे. कारण देश की आवाम ने यह उसी समय तय कर लिया था जब विवादास्पद राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद प्रकरण पर उच्चतम न्यायालय का फैसला आया था. जिसमे उस स्थल पर राम मंदिर बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ और मस्जिद के लिए भी अयोध्या में ही पांच एकड़ जमीन देंने का फैसला हुआ, जिसका देश ने एक स्वर से स्वागत किया. आज भव्य और दिव्य राम मंदिर निर्माण का श्री गणेश हो चुका है और मस्जिद की जमीन भी मिल चुकी है. वहाँ भी काम शुरु है. उस फैसले के समय भी कुछ लोग मीन-मेख निकालते रहे है, लेकिन देश की आवाम की एकजुटता के सामने इस मुद्दे को चर्चा में रखने का उनका कुत्सित मंसूबा नाकाम रहा. उनकी आधारहीन बातें न कोर्ट ने सुनी और न ही देश की आवाम ने. अब इस फैसले के बाद भी वहीं लोग सक्रिय है. किसी को ऐसा कर अल्पसंख्यक मत अपने पाले में रखना है, किसी को अपने आपको महत्वपूर्ण बनाये रखने के लिए कुछ न कुछ खुराफात करते रहना है. अपनी नादानी में ये तथाकथित बड़े लोग और कांग्रेस जैसी हार से दिग्भ्रमित पार्टी, जिसे यह समझ ही नहीं आ रहा है कि वह क्या करेे कि उसकी लोगों में साख बहाल हो. इस पुराने विवाद के पैरोकार इक़बाल अंसारी से भी कुछ सीख नहीं ले रहे है, जिन्होंने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि उनके लिए यह मामला तभी खत्म हो गया था, जब मन्दिर का फैसला आया था. अब सबको मिलजुल कर देश की प्रगति यात्रा में सहभागी होना चाहिये, और बार-बार उस बात को उठाते नहीं रहना चाहिए, जो अब इतिहास बन चुकी है. लेकिन ऐसा करेंगे तो ओवैसी और जिलानी जैसे नेता अपनी दुकान कैसे चला पायेंगे? वैसे इन्हें यह याद रखना कि बांटो और राज करो की राजनीति जो हमें अंग्रेजों से विरासत में मिली थी, और लम्बे समय तक कांग्रेस भी उस पर चलती रही अब मोदी युग में दम तोड़ चुकी है. लोग कांग्रेस से इतर शासन का भी स्वाद चख रहे है, देश और दुनिया उसकी धमक भी देख रही है. तो अब वादों की राजनीति का युग समाप्त हो रहा है. अब वही आगे बढ़ेगा जो पूरे देश के हर नागरिक को एक इकाई मानकर काम करेगा. अगड़ा-पिछड़ा अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक का खेल काफी खेला गया, अब वक्त 'बीती ताहि बिसारि देहि अब आगे की सोच' वाली सोंच का है. इसलिए जिलानी और ओवैसी को भी अब बार-बार अतीत में झाँकने की जरुरत नहीं है. देश की आवाम चाहे वह जिस जाति धर्म व क्षेत्र की हो उसने देश के विकास को लेकर एक तरह सोचना सीख लिया है. मोदी युग में वह जान गयी है कि इसी में उसका और देश का हित है. इसके विपरीत सोचने वाले सावधान हो जाएं, अन्यथा उनका भी राजनैतिक-सामाजिक वजूद लोगों को बांटने की भाषा के इस्तेमाल, उसमें मीन-मेख निकालने और गड़े मुरदे उखाड़ने से नहीं बचेगा, बल्कि सकारात्मक सोच से बचेगा.

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