कोरोना काल में बढ़ा कुपोषण

मुंबई

पिछले कई सालों से कुपोषण के मामले में सुर्खियां बटोरने वाले पालघर जिले में कुपोषण का खात्मा नहीं हो पा रहा है। सरकार द्वारा आदिवासियों के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं का ठीक से क्रियान्वयन नहीं होने से इसका लाभ गरीबों को नहीं मिल पा रहा है। लॉकडाउन के दौरान पालघर जिले की विभिन्न तालुकाओं (तहसीलों) में कुपोषण के चौंकाने वाले आंकड़े एक बार फिर सामने आए हैं। कोरोना काल के दौरान मार्च से अगस्त तक 6 महीने में 1493 बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। 

एक तरफ लॉकडाउन से बंद ग्रामीण इलाकों में बढ़ती बेरोजगारी तो दूसरी तरफ कुपोषण के बढ़ते आंकड़े पालघर प्रशासन के लिए सिरदर्द बन गए हैं। कोरोना और लॉकडाउन के चलते जिले के आदिवासी क्षेत्रों में आंगनवाड़ियों, ग्राम बाल विकास केंद्रों, स्वास्थ्य सुविधाओं आदि पर ध्यान केंद्रित करने में प्रशासन की विफलता के कारण जिले में एक बार फिर कुपोषण बढ़ा है। पालघर जिले में मार्च से अगस्त तक के छह महीनों में पिछले साल की तुलना में इस साल 100 से अधिक अति तीव्र कुपोषित (एसएएम) और 1000 से अत्यधिक गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे (एमएएम) की चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। जिले में पिछले साल मार्च से अगस्त तक 1376 गंभीर रूप से कुपोषित और 12684 अत्यधिक गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे मिले थे। जबकि इस वर्ष 1493 गंभीर रूप से कुपोषित और 14013 अत्यधिक गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे पंजीकृत किए गए हैं। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष 117 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित तो अत्यधिक गंभीर रूप से 1329 कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़ी है। पालघर जिले के विक्रमगढ़, जव्हार, मोखाड़ा, तलासारी, डहाणू के आदिवासी बहुल तालुकों में ग्रामीण क्षेत्रों में कई लोगों ने शिकायत की है कि परिवारों और गर्भवती महिलाओं के साथ कुपोषित बच्चों को प्रदान किया जाने वाला पौष्टिक भोजन लाभार्थियों तक नहीं पहुंच रहा है। भगवान महादेव साम्बरे अस्पताल के चिकित्सा अधिकारी सचिन पलुस्कर ने कहा कि पालघर जिले के ग्रामीण इलाकों में ये कुपोषित बच्चे प्रोटीन और विटामिन की कमी से पीड़ित हैं, जबकि जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सिद्धाराम सलीमथ ने बताया कि कुपोषण में चौंकाने वाले वृद्धि के बावजूद अन्य वर्षों की तुलना में कुपोषण के आंकड़े संतोषजनक हैं। 


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