राजस्थान की खस्ताहाल कानून व्यवस्था

राजस्थान के करोली जिले में एक पुजारी को जला कर मारने की घटना वह भी दिन दहाड़ें, किसी भी राज्य के कानून व्यवस्था की दारुण स्थित को दर्शाती है. गहलोत ने जबसे इस बार राजस्थान की सत्ता संभाली है लगातार अपनी कुर्सी बचाने और पार्टी के अंतर्गत व्याप्त गुटवाद और अंतर्कलह से निपटने में ही व्यस्त रहते है. उनका ध्यान शासन-प्रशासन पर कम है, जो न उनकी सरकार की सेहत की लिए ठीक है और न ही कांग्रेस पार्टी के लिए. मंदिर की कुछ जमीन है जिसपर मंदिर का पुजारी पूजा-अर्चना के अलावा उस जमीन पर खेती बारी कर अपना गुजर-बसर भी करता है. उस मंदिर की जमीन पर गाँव के किसी दबंग की नजर थी और वह जमीन हथियाना चाहता है, उसने जबरदस्ती बाड़ा लगाने की कोशिश की इसलिए पुजारी ने बाड़ा लगाने का विरोध किया तो उसमें आग लगा दी जिसमें पुजारी पूरी तरह झुलस गया और अंतत: दम तोड़ दिया. इसके पहले भी अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार और उत्पीड़न की बातें सुर्खियाँ बनती रही है. इन सब वारदातों पर गहलोत सिर्फ सफाई देते नजर आते हैं कि कारवाई हो रही है, जबकि वारदातें कम नहीं हो रही है, बल्कि बढ़ रही है. उनकी इस ढिलाई के चलते कांग्रेस आलाकमान को भी शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ता है. अभी हाल में जब राहुल गांधी और प्रियंका हाथरस की घटना को लेकर धरती पाताल एक कर रहे थे, तो उस समय भी विरोधियों द्वारा बार-बार राजस्थान में हुए बलात्कार के मामले और दलित उत्पीड़न के तमाम मामलों का हवाल देकर कांग्रेस से यह पूछा गया कि राजस्थान में हो रहे ऐसे कुकृत्यों पर आला कमान क्यों नहीं इतनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करता? तब भी मुख्यमंत्री गहलोत सफाई ही दे रहे थे. सरकार के मुुखिया का काम सफाई देना नहीं है, बल्कि ऐसा शासन देना है कि राज्य का विकास हो और राज्य की कानून व्यवस्था चुस्त दुरुस्त बनी रहे. गहलोत के नेतृत्व में हमेशा कांग्रेस का बंटाधार ही हुआ है, जब-जब भी उनके नेतृत्व में कांग्रेस राज्य में चुनाव लड़ी है तब-तब हारी है. आलाकमान की निष्ठा सतत सयाा दिला देती है, लेकिन आज कांग्रेस का देश में वह दौर नहीं है और उनकी कुर्सी के ऊपर अभी भी पायलट का खतरा बरकरार है.

ऐसे में निश्चितता की कोई जगह नहीं है. एक जमाने में जिस कांग्रेस का झंडा पूरे देश में सूरज की तरह चमकता था, आज कहीं-कहीं ही तारे की तरह टिमटिमा रहा है. जिस तरह की अक्षमता का परिचय गहलोत सरकार दे रही है, उसके मद्देनज़र इनके भी तेजहीन होने और अंतत: लुप्त होने में देर नहीं लगेगी. कोई भी सरकार लोकप्रियता इसलिए नहीं पाती कि उसने कितने दिन शासन चलाया बल्कि उसके काम उसे लोकप्रिय और अजर-अमर बनाते है. जब उसके मुखिया का पूरा ध्यान अपनी सत्ता टिकाने में ही रहेगा तो वहां का शासन कैसा होगा इसका सहज ही अनुमान लगया जा सकता है.

राजस्थान में सयाा बरकरार रखने के लिए शासन की जो अनदेखी हो रही है, वह कारण है कि राज्य में ऐसी-ऐसी घटनाएं हो रही है कि सरकार को देशव्यापी फजीहत का सामना करना पड़ रहा है. इसलिए गहलोत यदि अपना और कांग्रेस का भला चाहते है तो अब उन्हें अपना ध्यान राज्य में सुशासन लाने की ओर भी इनायत करना होगा. राज्य में ऐसा महौल बनाना होगा जिससे हर व्यक्ति चाहे वह जिस किसी भी जाति वर्ग को हो सुरक्षित महसूस करे और राज्य का सही विकास हो. हाँ यदि उन्होंने यह तय ही कर लिया हो कि फिर न खुद सत्ता में आना है और न कांग्रेस को आने देना है, तो कोई बात नहीं.

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