वोटरों की आई मौज, पार्टी कार्यालयों में भोज-भात का दौर

गया

लोग कहते हैं कि गरीबी एक गेम है, जिसको खेलना आ गया, उसकी बल्ले-बल्ले। वादों का जाल फेंकिए। नारों की नागाड़ेबाजी कीजिए। आश्वासनों का झुनझुना बजाइए। दाल-रोटी वाला जुमला उछालिए। फिर आपका पंचवर्षीय त्योहार जगमग-जगमग। गरीब जनता आपके पीछे-पीछे...और यह सारी बातें गया शहर में हकीकत तरह दिख रही है। भोज-भात के साथ इस गेम की शुरुआत हो गई है। पार्टी कार्यालयों में दावतें हो रही हैं। कहीं लाइन लगाकर लोग इसमें शामिल हो रहे हैं तो कहीं मेज-कुर्सी लगाकर खिलाया जा रहा है।

लगभग सभी पार्टी कार्यालयों में हर दिन भोज-भात चल रहा है। लंबी-लंबी लाइने लग रही हैं। कहने के लिए पार्टी कार्यकत्ताओं के लिए भोज-भात है, लेकिन हकीकत कुछ और है। खाना खिलानेवाले एक कार्यकता ने गणित समझाया कि हर दिन 1000- 1200 लोगों को खाना खिलाया जा रहा है। इसमें से 60 फीसदी वोट पक्का मानिए। सामने खड़े 60 वर्षीय रिक्शा चालक रामसुभग ने कहा कि सुबह-शाम का खाना मिल जा रहा है, यह बड़ी बात है। चुनाव बाद तो पता ही है कि कुछ नहीं मिलने वाला...। तब तक 20 वर्षीय राजेश बोला कि हम ठेला पर सब्जी बेचते हैं। फ्री में खाना मिल रहा है, तो उड़ा रहे हैं। लेकिन इतने बुड़बक नहीं हैं कि वोट दे देंगे।



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