विनाश काले विपरीत बुद्धि...

यह कहावत कांग्रेस पार्टी पर शत-प्रतिशत लागू होती है. पार्टी अपनी आधारहीन टिप्पणियों और अल्पसंख्यक परस्ती के चलते रसातल में पहुंच गयी है. लेकिन उसे अभी भी सदबुद्धि नहीं आ रही है. अभी भी पार्टी और उसके वरिष्ठ नेता देश की बदली राजनीति, बदले एजेंडे और भारतीय आवाम के बदले हुए मिजाज को नहीं समझ पा रहे है. क्या चीन और पाकिस्तान को लेकर की जा रही नादान और अर्थहीन टिप्पणियाँ कम थी, कि कांग्रेस आर्टिकल 370 और 35ए को लेकर एन सी और पीडीपी एवं जम्मू कश्मीर के अन्य राजनैतिक दलों के अलगाववादी रवैय्ये और उनके द्वारा शुरू की गयी मुहिम के साथ सुर मिला रही है. क्या चिदंबरम और गुलाम नबी आजद जैसे नेता इतने नादान है कि उन्हें अभी भी यह लगता है कि जो एजेंडा देश के लिए कांग्रेस तय करती है, उसे देश का आवाम मानता है. वह ओहदा कांग्रेस देश में 1989 से ही खो चुकी है, तब से लेकर भले ही उसने 2014 तक कई बार गंठजोड़ से या जोड़-तोड़ से वहां सत्ता हासिल की लेकिन देश ने उसे कभी पूर्ण बहुमत नहीं दिया और 2014 से लेकर आज तक इस लायक भी नहीं छोड़ा कि उससे नेता प्रतिपक्ष तक का पद भी संसद में हासिल हो सके. लगता है कि इन नेताओं ने यह तय कर लिया है कि कांग्रेस को पनपने नहीं देना है. इसलिए पहले से ही हिचकोले खा रही कांग्रेस की नाव में अपनी नादानियों का रोज नया-नया पत्थर डाल रहे है, जिससे वह डूब जाय. विनाश काले विपरीत बुद्धि के शिकार ये नादान यह नहीं समझ रहे है कि चीन के हाथों हमारी सबसे ज्यादा फ़ज़ीहत कांग्रेस के शासन काल में ही हुई है. पाकिस्तान का आतंकी कारोबार कांग्रेस शासन काल में ही देश व्यापी हो गया था. देश में उनके कार्यकाल के समय कहीं न कहीं रोज बम फूटता था. कभी इन नेताओं ने सोचा कि ऐसा क्यों होता है? जबकि आज की केंद्र सरकार के नेतृत्व में सीमापार और सीमा के अन्दर होने वाली गतिविधियों पर सख्त नजर है, और सुरक्षा बालों को जैसे का तैसा जबाब देने की खुली छूट है. आज पूरा देश कुछ गुमराह अल्पसंख्यक नेताओं और कांग्रेस तथा लुप्तप्राय वामपंथियों को छोड़कर, भाजपा सरकार की पकिस्तान नीति और चीन नीति का स्वागत कर रहा है. ये हमारे दोनों पड़ोसी आज इस तरह फँसे हैं कि पाक को रोज पीओके जाने का डर सता रहा है, और चीन लद्दाख से कैसे निकले इसकी राह खोज रहा है. कांग्रेस और उसके नेता यह नहीं समझ पा रहे है कि उनकी अल्पसंख्यक परस्त और आवाम को बेवक़ूफ़ बनाओ, सदाा हासिल करो, बाद में उसके लिए कुछ न करो और भ्रष्टाचार की गंगोत्री बेरोक-टोक बहने दो. अब जनता समझ चुकी है, और यही हालत गुपकार घोषणा पर दस्तखत करने वाले कश्मीरियों की है, जो उस कश्मीरियत की रक्षा करने में पूर्णत: नाकाम रहे, जिसके लिए काश्मीर जाना जाता था. वहां से उसके असली नुमाइन्दों यानी काश्मिरी पंडितों को देश में ही शरणार्थी बनने को बाध्य किया, उन्ही के काल में उनकी पाक परस्ती ने कश्मीरी गुलदस्ते के अलग-अलग फूलों को तार-तार कर दिया. ये न आतंक रोक पाए न कश्मीरी पंडितो कों पुन: घाटी में बसाने के लिए कुछ कर पाए. खाली अपनी चौधराहट चलाते रहे. कुछ घराने और नेता मिलकर धरती के स्वर्ग का बेड़ा गर्क करते रहे, अब काश्मीर में नए युग का डंका बज चुका है, वहां नया सवेरा हो रहा है, वहां नया सूरज चमेकेगा और उसे पुराने ढर्रे पर ले जाने का कोई भी प्रयास या मुहिम चाहे वह फारुक करे या महबूबा और चाहे उनके साथ कांग्रेस आकर साथ मिले या कोई और, चाहे वह पाक से गुहार लागाये या चीन से, यह नाकाम ही होने वाला है. इनका बेड़ा गर्क ही होगा.


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