शुरू से ही निर्भयता की प्रवृत्ति का विकास जरूरी

 देश में महिलाओं को उत्पीडन, भेदभाव, अत्याचार से मुक्त करने का अभियान सदियों पुराना है. लगभग हर केंद्र सरकार और देश की राज्य सरकारों ने इस दिशा में कड़े कदम उठाये है. उन्हें बराबरी का हक़ समाज में हासिल हो इसके लिए अनेक कायदे -कानून बनाये गए है. संपत्ति में उनका अधिकार सुनिश्चित करने से लेकर मुफ्त शिक्षा, शादी-ब्याह के लिए सहूलियतें आदि तमाम कदम उठाये गए है. बावजूद इसके आज भी स्थित संतोष जनक है ऐसा नहीं कहा जा सकता है. केन्द्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े भयानक और डराने वाले है जिसके अनुसार अभी भी ज्यादातर महिलायें घरेलू हिंसा का शिकार है. महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में इसका प्रतिशत सर्वाधिक है. अर्थात यदि सौ मामले अपराध के महिलाओं के प्रति समाने आते हैं तो उनमें 30 मामले घरेलू हिंसा के होते है. लॉकडाउन के इस काल में यह आंकड़ा अब तक के सारे रिकार्ड तोड़ गया है. इसके बाद क्रमश: छेड़छाड़, दहेज़ के लिए उत्पीडन, अपहरण, बलात्कार और अन्य तरह के अपराध है. ये सारे आंकड़े किसी भी सभ्य समाज को सिहराने वाले है. यह हकीकत उस देश की है जहाँ नारी का स्थान देवी का है. पूरे देश में किसी न किसी रूप में मातृशक्ति की पूजा की जाती है. ऐसा भी नहीं है कि अपराधियों पर करवाई नहीं हो रही है. लोगों को उनके ऐसे कुकर्मों के लिए गिरफ्तार किया जा रहा है और उन्हें तरह-तरह की सजाएँ भी मिल रही है, लेकिन अपराधों और अत्याचारों का आंकड़ा सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता ही जा रहा है. ऐसे-ऐसे विद्रूप तौर-तरीके अपराधी अपनाते नजर आते हैं, अपने कुकर्मों को अंजाम देते समय ऐसे विकृत मानसिकता और पतित आचरण का परिचय देते है, कि उसे सुनकर या उसके बारे पढ़कर व्यक्ति यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि ऐसे कुकृत्य करने वाला आदमी इंसान था या इंसानियत की खाल ओढ़े कोई वहशी दरिंदा. तो इस अवस्था का अब कानूनी इलाज करने के साथ-साथ समाजिक रूप से भी गहन अध्ययन करने की जरूरत है. ऐसा क्या कारण है कि तमाम प्रगति के, तमाम जागरूकता अभियानों के, कड़ी कारवाईयों के बावजूद भी महिलाओं को लेकर समाज में इतनी निराशाजनक, डरावनी और कहीं-कहीं अमानवीय स्थिति का दर्शन क्यों हो रहा हैं? कहीं न कहीं गड़बड़ी समाज की उस अक्षमता में भी है जो अभी भी महिलाओं के लेकर अपनी प्राचीन मान्यताओं, परम्पराओं और रूढ़ियों से ऊपर नहीं उठ पा रहा है. आज भी अनपढ़ तो छोडिये पढ़े लिखे घरों में भी लड़का-लड़की में भेदभाव कायम है. लड़की को तो शुरू से ही सबकुछ बर्दाश्त करने की शिक्षा दी जाती है. जो स्वतंत्रता एक लड़के को परिवार व समाज देता है वह लड़की के लिए उपलब्ध नहीं है. जिस तरह के हादसे, दुर्घटनाएं, अत्याचार, उत्पीड़न और अपराध आज महिलाओं व युवतियों के साथ हो रहे है उससे इस प्रवृत्ति को बल मिलता है. यह समाज में भेदभाव की प्रžवृत्ति को बढ़ा रहा है, यह कोई नहीं सोचता. तो अब शुरू से ही माँ-बाप और परिवार द्वारा लड़का और लड़की में यह संस्कार डालने की जरूरत है कि दोनों समान है, कोई विशेष नहीं है और यही सच है. आज लड़की उस हर क्षेत्र में अपनी बुद्धि, कुशलता व हिम्मत का डंका बजवा रही है, जो एक जमाने में पुरुषों का एकाधिकार समझा जाता था. तो फिर उसकी ऐसी मानसिकता बनाना कैसे सही हो सकता है कि तमाम तरह के अत्याचार सहकर भी जन्म-जन्मान्तर का रिश्ता निभाओं, या छेड़छाड़ की शिकायत करने पर बाहर निकलना बंद हो जाएगा, इसलिए चुपचाप सहते रहों. अब इन सब बातों पर विचार कर समाज के हर पालक को उस तरह का माहौल अपने घर में देना होना जिससे कोई भी लड़की या युवती बेहिचक उसके साथ होने वाले किसी भी तरह के दुर्व्यवहार, उत्पीडन या अत्याचार के खिलाफ मुखर होकर उसका प्रतिकार कर सके. किसी भी तरह के डर के चलते या परिवार की प्रतिष्ठा के लिए या लोकलाज के लिए कुछ भी झेलने को ही अपनी नियति न माने, तभी बात बनेगी. अब शुरू से ही उसमें निर्भयता की प्रवृत्ति पैदा करनी होगी. 

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