एक अभिनंदनीय पहल

सेंट्रल गवर्नमेंट वाटर ऑथारिटी द्वारा जारी नए फरमान के अनुसार पीने योग्य पानी की बर्बादी या बेवजह इस्तेमाल दंडात्मक अपराध माना जाएगा, एक अभिनंदनीय कदम है. देश में ऐसे मुद्दों पर जिस तरह की असंवेदनशीलता दिखाई देती है, और जिस तरह दुनिया भर में विशेषज्ञ भविष्य में गंभीर जल संकट की भविष्यवाणी कर रहे हैं, हमारे देशवासी उसे गंभीरता से नहीं ले रहे है. जल संरक्षण के परम्परागत तौर -तरीकों की आधुनिक मशीनरी की सहूलियतों के चलते जो अनदेखी हो रही है, देश के हर हिस्से में जिस तरह बोरिंग, नलकूपों से सिंचाई हो रही है, और तालाब कुएं भठ रहे है उससे देश के कई भागों में जल स्तर भयावह हद तक नीचे गया है. कारण तालाबों और कुवों में भरा पानी जमीन के अन्दर पानी की नसों को संजीवनी प्रदान करता है. हमारे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के रहिवासियों की भूमि-पिपासा और आबादी की बढ़त के हिसाब से उसके लिए जमीन की आवश्यकता इन्हें पटवा रही है. लोग बिना जरूरत भी पानी का दुरुपयोग करते दिखते है. खेतों और नलों में पानी बहता रहता है, लोगों को यह एहसास ही नहीं होता कि, वह ऐसा कर कितना बड़ा नुकसान कर रहे है. इस बारे मे जागरूकता के सरकारी और गैरसरकारी प्रयास लोगों की अज्ञानता और नादानी के चलते नाकाफी साबित हुए है. इसलिए दंडात्मक प्रावधान जरूरी था. कारण हवा और पानी सबसे जरूरी चीजें है, और यदि यही सही और समुचित रूप से लोगों को उपलब्ध नहीं रहेगा, तो कैसे काम चलेगा? अब पीने योग्य पानी बर्बाद करने वाले को एक लाख जुर्माना और पांच साल की सजा का प्रावधान है. उम्मीद है कि इसके बाद तो लोग चेंतेंगे, और अपनी बेपरवाही एवं उदासीनता से जो अपना और अपनों का जीवन खतरे में डाल रहे है, उससे बाज आयेंगे. ऐसी ही सख्ती पर्यावरण संरक्षण से संबंधित बिन्दुओं पर भी जरूरी है. जहाँ लोगों की हठधर्मिता के चलते काफी नुकसान हो रहा है.


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