उदित राज का एक और विवादास्पद बयान

कुछ लोग जहां भी रहें, यदि वे कुछ विवाद न खड़ा करें तो उन्हें मजा ही नहीं आता और उन्हें अपनी जिन्दगी निरर्थक लगने लगती है. उदित राज उसी श्रेणी के नेता है उन्हें लगता है कि कुछ भी बोल कर वे बहुत बड़े नेता बन जाएँगे, पर ऐसा नहीं है. इसके पहले भी देश में बड़बोले और स्वयं घोषित दलित या अन्य समाज के चैम्पियनों की कमी नहीं रही है. अपने राजनीतिक उषाकाल में मायावती भी इसी तरह किसी के बारे में कुछ भी बोल जाती थी, लेकिन वक्त के साथ उन्हें भी एहसास हुआ कि किसी को अपशब्द बोलकर कुछ हासिल नहीं किया जा सकता. ऐसा बोलने वाले का लम्बे समय तक भला नहीं हो सकता. अतीत के गड़े मुर्दे उखाड़ कर वर्तमान को सही नहीं किया जा सकता, उससे कटुता ही बढ़ती है. वैसा ही एहसास धीरे-धीरे ही सही, उदितराज को भी होगा. उनका बड़बोलापन और बेतुकी बयान बाजी ही वह सबसे बड़ा कारण रही है जिसके चलते उन्हें कई पार्टी छोड़नी पडी. कारण उन्हें कोई बहुत दिन तक झेलने को तैयार नहीं था. उन्हें एक समाज विशेष का नेता बनने की जल्दी है, वे सदियों पुरानी मान्यताओं और परम्पराओं को एक ही झटके में ठीक करना चाहते है जो असंभव है. अब उन्होंने कांग्रेस का दामन पकड़ा है लेकिन जिस तरह की बयान बहादुरी वह दिखा रहे है उसके चलते यह कहना मुश्किल है कि, वह वहां कितना दिन ठहर पायेंगे? जिस तरह उन्होंने कुंभ पर सवाल दागा और फिर ट्विट हटाया -लगाया, उसी से लगता है कि उनकी बात जिस उत्साह से उन्होंने कही थी, उस भावना से उसका स्वागत नहीं हुआ. अभी भी वक्त है सभंल जायं नहो तो हमारे देश में अतिरेक के लिए कोई जगह नहीं है. जो ऐसा करता है उसे जनता खुद ही अपने मताधिकार के प्रयोग से दरकिनार कर देती है. उदित राज को यह समझना चाहिए कि वे जिस तरह विवादास्पद और बेतुके बयान देकर अपनी उपस्थिति का एहसास कराना चाहते है, और अपने को प्रासंगिक बनाये रखना चाहते है, वह रणनीति पहले भी कई लोग अजमा चुके है. वह नकारात्मक चर्चा को बढ़ाने के सिवाय कुछ नहीं करती. 


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