मोदी हैं तो मुमकिन है

 हार की आवाम ने सारे एग्जिट पोल्स को धता बताते हुए एक बार फिर राजग सरकार बनने का रास्ता साफ़ कर दिया है, और जिस तरह भाजपा बिहार में अपनी स्थिति मजबूत की है. उससे यह एक बार फिर साबित हो गया है कि प्रधानमंत्री का करिश्मा अभी भी लोगों के सर चढ़ कर बोल रहा है. कांग्रेस राजद महा गठबंधन तमाम प्रयासों के बावजूद जीत का आंकड़ा नहीं हासिल कर पाया. इसका मतलब साफ़ है कि प्रधानमंत्री की लोक कल्याणकारी योजनाओं और उनके आतंकवादी पाक व विस्तारवादी चीन से मुकाबले में भारी पड़ने और देश में व्याप्त असमानता को दूर करने में जो काम उनके नेतृत्व में हुए है, जनता उसकी कायल है. बिहार ही नहीं देश के कई राज्यों के उप चुनावों में भी विपक्ष ने कोरोना प्रबंधन, प्रवासी मजदूरों की समस्या, बेरोजगारी, नया कृषि कानून, आदि मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री को घेरने की जी भर कर कोशिश की, लेकिन उसका उलटा असर हुआ और प्रधानमंत्री का काम इन सब पर भारी पड़ा. इन संघर्षों में जैसे सोना आग में तपने के बाद और चमकदार होता है, वैसे ही भाजपा बिहार सहित देश के अन्य राज्यों में हुई, जिसका लाभ भाजपा को आगामी बंगाल और तमिलनाडु के चुनावों में भी मिलना तय है. इस सफलता से नि:संदेह भाजपा के कार्यकर्ताओं के मनोबल में और वृद्धि होगी. चिराग पासवान भले ही अपना खाता नहीं खोल पाए, लेकिन उन्होंने महागठबंधन और नितीश के लिए अच्छी खासी परेशानी खड़ी कर दी थी. मतों का जो प्रतिशत उनके पास गया यदि वह बराबर नितीश या महागठबंधन को जाता तो शायद नजारा कुछ और होता. इन सबका परिणाम यह हुआ कि बिहार में नितीश की पार्टी तीसरे नंबर पर पहुंच गयी, भले ही उनकी साफ़ सुथरी छवि की इस गठबंधन की विजय में प्रमुख भूमिका रही, लेकिन जीत का असली सेहरा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ही सर बंधता है. कारण उनकी उज्वला योजना, किसानों के खातों में सीधे धन, बिहार के विकास के लिए योजनाओं की भरमार आदि का बड़ा फयादा इस चुनाव में भाजपा व जदयू को मिला है जिसमें विशेषकर महिला वर्ग का भारी समर्थन इसका द्योतक है. उक्त परिणाम यह स्पष्ट करते हैं कि आज भी देश के जनमानस में मोदी के कामों का डंका बज रहा है. हाँ इस बार तेजस्वी यादव बिना लालू और राबड़ी के सहयोग से अपनी पार्टी को बिहार में नंबर एक पर रखने में कामयाब रहें, वह भी अपने दम पर. वह साबित कर चुके हैं कि बिहार के राजनीतिक क्षितिज पर एक नया नेता पैदा हो चुका है. हार-जीत अपनी जगह लेकिन उन्होंने बिहार की राजनीति में अपना एक मुकाम साबित किया है. जबकि चिराग और अन्य वोट-कटुवा दल जो चुनाव आते ही दिखाई देंन लगते है कुछ ख़ास नहीं कर पाए लेकिन एमआयएम व उक्त दलों ने महागठबंधन की बैंड बजाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. कांग्रेस के नेताओं ने फिर 'इवीएम' बाबा के नाम पर बेसुरा राग अलापना शुरू कर दिया है, जो उनकी ही पार्टी के कई लोगों को रास नहीं आ रहा है. जीते तो सब ठीक, नहीं तो सारा दोष 'इवीएम' पर मढ़ दो. यह कांग्रेस जैसी पार्टी के लिए अशोभनीय और लज्जाजनक है. हार को हार मानने की हिम्मत दिखानी चाहिए और उन कारणों को तलाशना चाहिए जो देश की राजनीति में उसे कालबाह्य कर दे रही है. अपनी हार छुपाने के लिए हस्यास्पद बहानों का सहारा लेने के लिए बाध्य कर रहे है. 'मोदी है तो मुमकिन है' यह सिर्फ नारा नहीं है, उसके पीछे ऐसा काम है, जिसकी आज देश व दुनिया में गूँज है. देश के चहुमुखी विकास का रोड मैप हो, या पाक व चीन को उनकी औकात दिखाने की बात हो, या फिर समाज के दबे कुचले वर्ग को उठाने के लिए उन तक साधन -सुविधा पहुँचाने की बात हो इस मोदी युग में प्रधानमंत्री की दृष्टि हर जगह पहुंचती ही नहीं उस पर हर ओर काम भी होता है, और उसका फल लक्षित तबके तक पहुंचता है. 


Post a comment

[blogger]

MKRdezign

Contact form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget