अब घर पर मनेगी अर्नब की दिवाली

सुप्रीम कोर्ट से मिली अंतरिम जमानत

Arnab Goswamy

मुंबई

सुप्रीम कोर्ट ने रिपब्लिक चैनल के पत्रकार अर्नब गोस्वामी को बड़ी राहत दी है। अभियोजन और बचाव पक्ष की तमाम दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अर्नब गोस्वामी और अन्य दो आरोपियों को अंतरिम जमानत दी है। अदालत ने प्रत्येक को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके पर तत्काल छोड़ने का आदेश दिया है। इससे तय हो गया है कि अब अर्नब की दिवाली उनके घर में ही मनेगी। इस मामले में कई दिनों से चल रही अदालती सुनवाई पर पूरे देश की निगाह लगी हुई थी।

महाराष्ट्र सरकार द्वारा आर्किटेक्ट अन्वय नाइक को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में अर्नब और दो अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। अर्णब की जमानत याचिका मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा खारिज कर दिए जाने के कुछ घंटों बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दायर की थी। न्यायमूर्ति धनंजय चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की पीठ के समक्ष हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय से अर्नब गोस्वामी को जमानत देने के मामले में चूक हुई है। उच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को इनकार करते हुए उचित कार्रवाई नहीं की है। उल्लेखनीय है कि मुंबई उच्च न्यायालय ने अर्नब को दो अन्य मामलों में अंतरिम जमानत देने से इंकार कर दिया और उन्हें स्थानीय अदालत में अपील करने को कहा। गोस्वामी के वकील द्वारा शीर्ष अदालत में दायर याचिका में अक्षता नाइक, केंद्र सरकार, अलीबाग पुलिस स्टेशन प्रमुख, मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह को प्रतिवादी के रूप में नामित किया था। राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता सचिन पाटिल ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल करते हुए कहा कि राज्य सरकार के बयान को सुने बिना गोस्वामी की याचिका पर कोई आदेश पारित न किया जाए। वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने अर्नब गोस्वामी का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने दावा किया कि अन्वय नाइक ने अपनी मां की हत्या कर दी और फिर आत्महत्या कर ली। दस्तावेजों से स्पष्ट था कि अर्नब गोस्वामी ने नाईक के सभी पैसे का भुगतान कर दिया था। नाइक की कंपनी कॉनकॉर्ड डिज़ाइन्स सात वर्षों से वित्तीय संकट का सामना कर रही थी। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि आप उनकी विचारधारा को पसंद नहीं कर सकते। इसे मेरे ऊपर छोड़ दो मैं भी उनका चैनल नहीं देखता। लेकिन अगर उच्च न्यायालय जमानत नहीं देता है, तो नागरिक को जेल में कैद कर दिया जाता है। हमें एक कठोर संदेश भेजने की जरूरत है। पीड़ित को निष्पक्ष जांच का अधिकार है। जांच जारी रहने दें। लेकिन अगर राज्य सरकारें इस आधार पर व्यक्तियों को निशाना बनाना जारी रखती हैं, तो एक कठोर संदेश सामने आना चाहिए। हमारा लोकतंत्र लचीला है। महाराष्ट्र सरकार को कुछ चीजों को नजरअंदाज करना चाहिए था। अगर किसी की निजता का उल्लंघन होता है, तो यह न्याय पर हमला होगा।


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