भ्रष्टाचार के वंशवाद की कमर तोड़ना जरूरी

राजनीति और भ्रष्टाचार का हमारे देश में चोली-दामन का साथ रहा है. हमारे हर राज्य में राजनैतिक घराने है, जिनके सामने कोई कारोबार नहीं दिखता, लेकिन वे और उनका परिवार राजा-महाराजाओं की तरह जीवन बिताते है और चाहे जो हो जाय सत्ता नहीं छोड़ते. चाहे उसके लिए कितना भी पाला बदलना पड़े और पापड़ बेलने पड़े, ज़रा भी परहेज नहीं करते. देश ऐसे घरानों से भरा पडा है. जिस भी राज्य में चले जाइए ऐसे दर्जनों परिवार मिल जायेंगे, जिनकी पूरी जीविका राजनीति ही हैं, उसके बल पर सत्ता हासिल कर अपना और अपनों का व अपने पिछ्लग्गूओ का हर विधि कल्याण ही इनका धेय्य वाक्य है. इसके चलते देश का कितना नुकसान हुआ है, इसका आंकलन करना भी मुश्किल है. ये सबाा का उपयोग कर धनबल व बाहुबल से अपने आपको मजबूत करते है, और हर हाल में अपने को सत्ता में महत्वपूर्ण बनाये रखना ही इनके जीवन का लक्ष्य है. कुछ भी हो जाय इनके ही परिवार चलनी चाहिए, इसके लिए प्रचुर धन और जन बल की जरूरत होती है, जिसकेलिये ये अपनी सत्ता के रसूख का इस्तेमाल करते है. देश में इनके इलाकों में इनकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता. अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए अपराधियों को पालने और उन्हें टिकट देकर सफ़ेदपोश बनाकर अपने निहित हितों के लिए इस्तेमाल करने आदि पातक करने में भी नहीं हिचकते. कुछ दलों पर तो टिकट बेचने को ही धंधा बनाने का भी आरोप लगता है. यही कारण है कि कई दल दशकों से सत्ता में रहे, लेकिन उनके नेतृत्व में वे उस राज्य को पिछड़ेपन के टैग से बाहर नहीं ला सके और कई मामलों में तो नकारात्मक कीर्तिमान बनाते नजर आये. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब पिछले दिनों अपने एक भाषण में भ्रष्टाचार के वंशवाद पर निर्णायक प्रहार करने की बात की थी, जो इसी ओर इशारा कर रही थी. इन घरानों ने अपने-अपने इलाके में ऐसी घेराबंदी कर रखी है कि कोई नया व्यक्ति वहां पनपने ही नहीं दिया जाता. कोई भी विकासात्मक काम बिना इन्हें इनका हक़ दिए या भेंट चढ़ाए आगे नहीं बढ़ सकता. यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसे तोड़ना जरूरी है. प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कार्यकाल के पहले ही चरण से इस खानदानी और सïंस्थागत स्वरुप अख्तियार कर चुके भ्रष्टाचार को निशाना बनाया है और कई प्रावधानों के तहत दी जाने वाली छूट या धन जो लक्षित वर्ग तक नहीं पहुंचती थी, अब सीधे उन तक जाने लगी है. यही नहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी मुहिम चल रही है जिससे राजनेता और अफसरशाही सब पर लगाम कसी जा रही है, लेकिन अभी भी स्थिति काबू में नहीं कही जा सकती. कारण ये देश में जगह-जगह अपने विशेषाधिकारों का टापू बना चुके है जो काफी मजबूत है. 'चित्त भी मेरी और पट्ट भी मेरी' की शैली से काम करते हैं और अपने विरोधियों से निपटने के लिए साम-दाम और दंड-भेद हर नीति का इस्तेमाल करते है. साथ ही सरकारी मशीनरी को भी पाने काबू में रखते है. तो इन्हें हिलाने के लिए देश और राज्य की सरकारें व अफसरशाही, देश की आंतरिक खुफिया एजेंसियों, सबको मिलकर एक सोची-समझी रणनीति के हिसाब से काम करना होगा, चाहे वह भले ही धीमी गति से हो, पर लगातार हो तभी इन पर अंकुश लगेगा. आज अधिकांश लोग बहुत जल्दी बड़ा आदमी बनने के लिए राजनीति में आते है, आराम की जिन्दगी गुजारने के लिए नौकरशाही का अंग बनते है, उनमें वह सेवा और समर्पण की भावना नहीं है, जो किसी भी देश के उत्थान के लिए जरूरी होती है. मोदीजी के सत्ता शिखर पर आने के तीन दशक पहले तक इस दिशा में कोई रोक लगाने की कोशिश भी नहीं की गयी. अब जबकि निजाम बदला है, तौर-तरीका बदला है, नयी सोच सामने रखी जा रही है, लोग सोच रहे है, लेकिन यह इतनी गहरी पैठ बना चुका है कि अचानक इसे नहीं तोड़ा जा सकता. इन्हें तोड़ने के साथ समाज को भी वैसा विकल्प मिलना चाहिए, जो सही राह पर चलते हुए मठाधीशों से उनका संरक्षण भी कर सके, और निहित स्वार्थी घरानों की और उनके संरक्षण में मजबूत हो चुके वंशानुगत भ्रष्टाचार की कमर तोड़ कर नए माहौल की शुरूवात कर सके.

Post a comment

[blogger]

MKRdezign

Contact form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget