बिजली बिल में रियायत क्यों?

मुंबई में वैसे भी बिजली बिल को लेकर जनता में कोरोना काल से पहले भी काफी आक्रोश रहा है. वह चाहे रिलायंस हो या अडानी, इनके बिलिंग पद्धति को लेकर सदा ही आशंका का माहौल आम उपभोक्ता में रहा है. साथ ही अनाप-शनाप बिलिंग लगाने पर जब उपभोक्ता उसके सन्दर्भ में अपनी फ़रियाद करना चाहता है तो फ़रियाद का तरीका काफी जटिल और दुरुह हो जाता है. उदाहरण के लिए मीरा रोड में समस्या है और उपभोक्ता वहां दस्तक देता है तो उसे बता दिया जाता है कि आपको अपनी सुनवाई के लिए कांदिवली या बांद्रा कार्यालय जाना होगा. कारण ऐसी फरियादों के सुनवाई की व्यवस्था वहां है. उपभोक्ता येन-केन प्रकारेण वहां पहुंचता है तो उसे इस तरह समझाया जाता है कि इसमें कुछ गड़बड़ नहीं है कि वह शिकायत करे. हताश -निराश वह दुबारा असंतुष्ट होने के बाद भी उधर का रुख नहीं करता. मुंबई जैसे महानगर में बिना बिजली एक पल भी काम चलाना दूभर है, बिजली आपूर्ति कर्ता कंपनियां इस तथ्य से भली भाँति अवगत है और उसके प्रशिक्षित कर्मी हर मामले को निपटाने में सिद्धहस्त हैं तो तमाम विरोधों के बावजूद स्थित में कोई परिवर्तन नहीं होता.

कभी कभार कोई जन प्रतिनिधि हिम्मत कर इनके खिलाफ आन्दोलानात्मक कदम उठाता है, तो वह भी एक दो बार की नारेबाजी से आगे नहीं बढ़ा पाता. कारण ये रसूखदार कंपनिया इतनी प्रभावी हैं कि जैसे ये चाहती हैं वैसे ही चलता है, इसके इतर कुछ हो सकता है नहीं लगता. कारण कितने भी विरोध हुए लेकिन धरातल पर कोई परिवर्तन इनके कार्य प्रणाली में नजर नहीं आता. केंद्र से लेकर राज्य तक इसके लिए सरकारों में अलग से विभाग है परन्तु आम उपभोक्ता से अनाप-शनाप और न समझ में आने वाले बिलों की वसूली बदस्तूर जारी है. बिलिंग को लेकर टाटा का काम अन्य प्रतियोगी कंपनियों की तुलना में अच्छा माना जाता है और उनके यहां शिकायतों की सुनवाई व उस पर उपचारात्मक कदम भी अन्यों की तुलना में काफी संवेदनशील तरीके से उठाये जाते रहे है. लेकिन लॉक डाउन के समय उसकी बिलिंग को लेकर अन्य कंपनियों की तरह जनता के आक्रोश का कारण बनी है. लॉक डाउन में लोग अपने घरों में ही रहने को मजबूर थे उसके चलते और लॉक डाउन में वर्क फ्राम होम होने के नाते बिजली के उपभोग में काफी बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन जिस तरह बिल को लेकर हाय तोबा मची हुई है और जिन घरों में वर्क फ्राम होम नहीं था वहां भी बिल बढ़े है. तो इस पर सबंधित विभाग को अपनी नजरें इनायत करना और आवश्यकता अनुसार कदम उठाना जरूरी था.

सरकार ने वैसा किया भी और राहत की भी घोषणा की. अब उस पर कुछ दूसरी बात कह कर या केंद्र पर डाल कर टालमटोल करना ठीक नहीं. जैसे सारे काम हो रहे हैं वैसे ही यह भी होना चाहिए. साथ ही विद्युत आपूर्ति करने वाली कंपनियों की पूरी कार्य प्रणाली की भी समीक्षा जरूरी है. बिल ऐसे बने जो आम उपभोक्ता समझे और उसकी कोई शिकायत हो तो उसकी सुनवाई के लिए सरल और सर्व सुलभ मेकेनिज्म हो जो उसके आवास के इलाकें में ही उपलब्ध हो. उपभोक्ता के साथ भटकाऊ और टरकाऊ शैली में व्यवहार न हो तभी राहत देने की नौबात नहीं आयेगी और आम उपभोक्ता के समय और श्रम की बचत होगी. साथ ही सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि आपदा काल में भी जो बिल आम उपभोक्ताओं को भेजा गया है और जिसको लेकर काफी जबर्दस्त विरोध दर्ज किया गया. क्या वह सही थे? उसकी जांच होनी चाहिए कि क्या उसमें कुछ गड़बड़ियां तो नहीं थी.

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