कांग्रेस का जर्जर होता जहाज

 जैसे-जैसे कांग्रेस हार के नित नए कीर्तिमान बना रही है और पार्टी नेतृत्व ऐसा व्यवहार कर रहा है कि, जैसे कुछ हुआ ही नहीं है. तो पार्टी के एक वर्ग में भयानक हताशा फ़ैल रही है, और अब यह हताशा व असंतोष खुल कर सामने आने लगा है. इसके पूर्व भी तमाम वरिष्ठ नेताओं ने पत्र लिखकर आला कमान का ध्यान पार्टी में फ़ैल रही इस हताशा की ओर आकृष्ट कराने की कोशिश की थी, लेकिन उसके बाद भी पार्टी की बदहाल स्थिति को लेकर कोई व्यापक मंथन नहीं हुआ. हां थोड़ी-बहुत संगठनात्मक क़तर-व्योंत जरूर हुई, लेकिन उससे पार्टी की रीति-नीति पर कोई फर्क नहीं पडा. अब एक बार फिर चिदंबरम पिता-पुत्र और कपिल सिब्बल जैसे नेता मुखर हुए है. इन नेताओं ने पार्टी की स्थिति पर आत्मचिन्तन और आत्मनिरीक्षण का नारा पुन: बुलंद किया है. उस पर भी जैसा अब तक होता आया है, आवाज उठाने वालों के खिलाफ परिवार भक्तों की गोल बंदी शुरू हो गई है. बजाय इसके इन मुद्दों को लेकर पार्टी में कोई सकारात्मक बहस शुरू हो, आवाज उठाने वालों को ही घेरने का खेल शुरू हो गया है और उन पर परिवार-माला जप कर सत्ता सुन्दरी का मजा लूटने वालों का कड़ा हमला शुरू हो गया है. उनकी बात भी किसी हद तक सही हो सकती है, कि लोगों को जो कहना था उसे पार्टी फोरम में कहना चाहिए था. लेकिन क्या पार्टी फोरम में ऐसा करने का अवसर मिलता है? इसके पूर्व भी जब दर्जन भर से ज्यादा नेताओं ने पत्र लिख कर चर्चा की पहल की थी, तो क्या कांग्रेस कार्य समित में उन्हें सुना गया? क्या उन्हे उल्टा विरोधी नहीं ठहराया गया और क्या वरिष्ठ नेताओं पर भाजपा से मिले होने का आरोप नहीं लगया गया? वहां भी यही वफादार कुछ बोलने नहीं देते और जब पार्टी हित में अपनी आवाज उठाना और पार्टी की कमियां गिनाना या सुधार के लिए कदम उठाने के लिए कहना पार्टी या आला कमान विरोधी गति विधि माना जाएगा, तो फिर कौन बात करने की हिम्मत करेगा? वह चुपचाप बर्दाश्त करेगा और जब बर्दाश्त से बाहर हो जाएगा तो वैसे ही हल्ला मचायेगा जैसा आज कई नेता मचा रहे है. ठीक है दो-चार बार यह आवाजें वफादारों द्वारा दबाई जा सकती है, लेकिन इससे पार्टी की हालत नहीं सुधरने वाली. जब पार्टी चुनाव दर चुनाव हारती रहेगी, तो पार्टी छोड़ो बाहरी सहयोगी भी पार्टी को कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकेंगे. जैसा आज बिहार में राजद नेता आरोप लगा रहे है, और जिस तरह उत्तरप्रदेश में सपा किसी भी राष्ट्रीय दल से समझौता न करने की बात कह रही है, उससे साफ़ जाहिर है कि कांग्रेस आज रसातल में पहुंच गयी है. साथ ही वह जिसके साथ जाती है उसे भी डुबो दे रही है. ऐसे में कांग्रेस आला कमान को अब सोचना होगा कि उसे अभी भी पार्टी को सही राह पर लाने के लिए और देश की राजनीति में प्रसांगिक बनाये रखने के लिए कुछ करना है, या परिवार भक्तों और चाटुकारों की ही सुन कर पार्टी का बेड़ा गर्क होते देखना है. कारण 2014 से पार्टी सत्ता से बाहर है, तब से लेकर कर देश की राजनीति का चेहर-मोहरा ऐसा बदला है, केंद्र सरकार का काम करने का फैसला लेने का ऐसा धमकदार तरीका सामने आया है, उसमें कांग्रेस नेता व कार्यकर्ता सब इस कदर चौंधियाये है कि उन्हें कुछ सूझ नही रहा है. हालत इतनी खराब है कि देश के विभिन्न राज्यों में पार्टी की हालत और उसके संगठनात्मक ढांचे को ही आला कमान नहीं समझ पा रहा है. चुनाव में जहां जैसी जरूरत है, वैसा दिशा-निर्देश नहीं दे पा रहा है और उस तरह का प्रचार नहीं कर पा रहे है, उदाहरण के लिए महाराष्ट्र और मौजूदा बिहार विधान सभा चुनाव लिया जा सकता है, जब पार्टी आला कमान कोई वैसी भूमिका नहीं निभा पाया, जितनी दरकार थी. कारण उनके रणनीतिकार और सलाहकार यहां उतनी अच्छी सफलता नहीं देख रहे थे. परिणामत: पार्टी जितना कर सकती थी उतना भी प्रदर्शन नहीं कर पाई और नेतृत्व छींटाकशी का पात्र बन गया. तो अब कांग्रेस आला-कमान को यह तय करना है कि उसे पार्टी बचाना है या उसे बर्बाद करना है. यदि बचाना है तो उसे अपनी रीति-नीति और कार्यशैली बदलते हुए कमियों को दूर करने के लिए आत्ा मंथन का दौर शुरू करना होगा. देश भर में संगठन की धौंस को मजबूत करना होगा, वरना पार्टी बड़ी तेजी से डूबने की ओर जा रही है. आज जो हालत है उससे न भक्तों का भला होगा, और न परिवार का. हिचकोलों से उबारने की कारवाई अनिवार्य है, अन्यथा कांग्रेस का जर्जर जहाज लंबे समय तक टिकेगा ऐसा नहीं लगता.

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