प्रदूषण को व्यापक दृष्टिकोण से देखने की जरूरत

हमारा समाज पर्यावरण शुद्धता की अनिवार्यता को लेकर उतना संजीदा या संवेदनशील नहीं है, जितना होना चाहिए. छोटे लाभ के लिए बड़ा नुकसान कर जाने की हमारी प्रवृत्ति इसमें सबसे बड़ा रोड़ा है. प्राकृतिक संसाधन सीमित है, यदि उसका उचित संदोहन नहीं होगा तो उसका संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है, और हमारे यहाँ तो लोगों ने अनुचित संदोहन करने का ठेका लिया है ऐसे लगता है. हम अपने घर के अन्दर सबकुछ व्यवस्थित रखते हैं लेकिन घर के बाहर साफ-सफाई को लेकर संजीदा नहीं हैं. यही बात यदि थोड़े शब्दों में कहें तो अपने आस-पास हरियाली का नुकसान कर, बाग़-बगीचों को वृक्ष विहीन कर कुओं-तालाबों को पाटकर हम अपना कितना बड़ा नुकसान कर रहे है, हमें इसका एहसास ही नहीं है. हर माँ-बाप को अपने बाल-बच्चों की चिंता है, उनकी पढ़ाई लिखाई व लालन-पालन के लिए हर व्यवस्था करते हैं लेकिन भोजन, वस्त्र, आवास के साथ शुद्ध हवा या पानी कितना जरूरी है, यह एहसास ही नहीं हो रहा है, जबकि इसके लिए कई दशकों से केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, जागरूक लोग, गैर सरकारी संगठन और सरकारी एजेंसियां प्रयत्नों की पराकाष्ठा कर रही है. यह करते-करते देखने को मिल रही लोगों की हठधर्मिता से इतने आजिज आ चुके है कि अब लोगों को अपने ही हाथों अपने और अपनी भावी पीढी के भविष्य पर कुठाराघात करने से रोकने के लिये दंडात्मक करवाई करने और जुर्माना वसूलने या सजा दिए जाने के प्रावधान करने की नौबत आ चुकी है. इसके पीछे कई बड़े कारण है, पहला जब तक आग हमारे दरवाज़े तक न पहुंचे, भले ही पूरा इलाका जल जाय तब तक निङ्क्षश्चत रहने की हमारी प्रवृति, दूसरा हमारा भला हो रहा है, तो फिर उससे पर्यावरण का नुकसान हो तो हमें क्या? और तीसरा लालच व चौथा जनसंख्या का दबाव और पांचवा पर्यावरण को दुरुस्त करने के लिए कुछ चुनिंदा क्षेत्रों को ही लक्षित करना. उदाहरण के लिए पटाखा को लीजिये, इससे पर्यावरण का भीषण नुकसान होता है, हम पटाखा कब जलाते हैं, दीपावली या इसके अलावा कभी कभार किसी मांगलिक या जश्न के अवसर पर, लेकिन देश के दर्जनों शहरों की आबोहवा पहले से ही काफी खराब है, तो यह पूरी तरह स्पष्ट है कि इसके लिए सिर्फ पटाखा ही जिम्मेदार नहीं है, वह भी इसका कारक है. तो हमें उन हर कारकों को ध्यान में रखकर सब पर एक साथ करवाई करनी होगी तभी बात बनेगी. चुनिन्दा क्षेत्रों पर ही काम करो और अन्य क्षेत्रों को कुछ भी करने दो तो फिर हालत नहीं सुधरने वाली. इसलिए जो भी करना है उसे समग्रता में करना होगा. हमारे आस-पास की नपा और मनपा को ही देख लें, रसूखदार लोग अपनी शक्ति का बेजा इस्तेमाल कर खुली जगहों पर जहां बाग़-बगीचे है, तालाब-कुँए है किसी न किसी तरह हथियाने पर लगे रहते हैं. उसके रख रखाव और मरमम्त को लेकर उदासीन है. यदि पर्यावरण को भी बचाना है तो हमें इससे संबंधित हर गलत बात को लेकर शून्य सहनशीलता की नीति पर काम करना होगा. कारण हम यह देख रहे हैं कि सिर्फ जागरूकता से ही काम नहीं चलेगा, और यह नीति उस हर बिंदु पर लागू करनी होगी, जिसके चलते देश में शुद्ध जल व शुद्ध हवा की कमी हो रही है, जो निकट भविष्य में एक बड़ी समस्या बन सकती है. साथ ही छोटा परिवार सुखी परिवार की महत्ता भी लोगों की समझ में आना जरूरी है. क्योकि बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या को मूल भूत सुविधायें पहुँचाने में भी पर्यावरण की काफी अनदेखी हो रही है.


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