हमारी सोच को सलामी मिलती रहेगी

अमेरिका में ट्रंप युग का अप्रत्याशित समापन हो गया है. जनवरी से नए विजेता जो बाइडेन और कमला हैरिस की जोड़ी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के रूप में दुनिया की सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्र प्रमुख पद की ज़िम्मेदारी सम्भालेंगे. ट्रंप युग में उनकी तमाम विचित्रताओं और बड़बोलेपन की प्रवृत्ति के बावजूद वह हमारे साथ चट्टान की तरह खड़े रहे और कुछेक पारस्परिक तल्खियों के बावजूद चाहे वह चीन के साथ हमारी लाग डांट हो या आतंकवाद का मुद्दा, उन्होंने हमारा साथ पूरी तरह दिया है और कूटनीतिक मोर्चे पर भी यही हाल रहा। स्व. नरसिहाराव के प्रधानमंत्री काल से ही शीत युद्ध की समाप्ति के साथ ही जो हमारी विदेशी नीति अमेरिका की तरफ और झुकाव हुआ तब से लेकर आज तक भले ही अमेरिका में कई राष्ट्रपति बने लेकिन दोनों देशों के रिश्ते लगातर प्रगाढ़ होते गए और मोदी युग में इसमें नित नए आयाम जुड़ते गए। आज आर्थिक, सामरिक और सांस्कृतिक हर स्तर पर दोनों देशों का रिश्ता शिखर पर है. आज अमेरिका का निजाम भले ही बदल रहा है. लेकिन उससे हमारे रिश्तों पर कोई असर पड़ेगा ऐसा कदापि नहीं है. कारण एक देश का दूसरे देश से संबंध एक तरफ़ा नहीं दो तरफ़ा होता है। आतंकवाद को लेकर, चीन को लेकर, मध्य एशिया को लेकर उसकी जो भूमिका और मंसूबा है, वह बिना हमारे सहयोग के पूरा नहीं होता। हमें भी दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र से अच्छे संबंध की जरूरत है। अमेरिका, जब तक कोई देश उसके हित के लिए मुफीद है तब तक उसका हाथ पकड़ने की लिए जाना जाता है, लेकिन हमें लेकर वह ऐसा नहीं कर सकता कारण उसे पता है कि हम कोई ऐरे गैरे नत्थू खैरे नहीं है. हम पाकिस्तान नहीं है कि कोई जैसा चाहे वैसा नचा दे. हम आर्थिक, सामरिक, कूटनीति या राजनीतिक दृष्टि से दुनिया की एक हस्ती हैं और वर्षों उसके विपरीत प्रवाह में रह कर शान से आगे बढ़े हैं. हम किसी भी देश पर अपने को थोपते नहीं और ना ही किसी पर निर्भर हैं, जो हमारे साथ सही है, उसके साथ हम भी सही हैं. इस दृष्टि से जितनी हमें अमेरिका की जरूरत है उतनी उसे भी हमारी है. इसलिए दोनों के रिश्तों में बाइडेन के आने से कोई फर्क नहीं पड़ता. कारण बाइडेन ओबामा के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति की भूमिका निभा चुके हैं, वे एक अनुभवी और परिपक्व राजनेता हैं. दुनिया में हमारी और अमेरिका में हमारे लोगों की स्थित और हैसियत की अच्छी जानकारी रखते है. यह अनायास ही नहीं है कि उन्होंने अपनी उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार एक ऐसी महिला को चुना जिनकी जड़ भारत से जुड़ी है. हमारे लिए अमेरिका महत्वपूर्ण है। हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सोनिया गांधी और अन्य नेताओं ने बाइडेन और हैरिस को विजय की शुभकामनाएं दी हैं. साथ ही दोनों देशों के मजबूत रिश्तों की कामना की है. अपने प्रचार में बाइडेन जिस तहर गर्मजोशी से हमारे देश के बारे में बोलते आये हैं उससे साफ़ है कि उनके लिए भारत कितना महत्वपूर्ण है. प्रधानमंत्री राजनय के कुशल खिलाड़ी हैं और दुनियाभर में टफ डीलर के रूप में जाने जाते हैं. भारत और अमेरिका का रिश्ता पारस्परिक कल्याण के साथ-साथ दुनिया के कल्याण की कामना करता है और दुनिया को आतंकवाद विस्तारवाद से मुक्त देखना और करना चाहता है. सारी बातें अभी विद्यमान हैं और जिन पर नियंत्रण या जिनका खात्मा सुरक्षित और समृद्ध दुनिया के लिए जरूरी है. भारत ने हमेशा अपनी विदेशी नीति में यही ध्येयवाक्य रखा है और जिसका समर्थन और अनुमोदन दुनिया ने किया है. और यही कारण है कि आज हमारी विदेश नीति का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है। हमारे चीन और पाकिस्तान जैसे विरोधी खुद अलग-थलग हो रहे है। इस सोच की अमेरिका को भी जरूरत है और सही सोच वाले हर देश को.


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