महामारी और मुनाफ़ा खोरी में पिसता आदमी

बड़ी मुश्किल से मुंबई और महाराष्ट्र में कोरोना काबू में आता दिख रहा है, लेकिन अभी विशेषज्ञ दूसरी लहर की आशंका व्यक्त कर रहे हैं और दीपावली के बाद के कुछ हफ्ते तक विशेष सावधानी अनिवार्य बता रहे हैं. साथ ही जबतक वैक्सीन नहीं आ जाती, तब तक सावधानी और एहतियात अपरिहार्य है. इसलिये कोरोना का संक्रमण कम हो रहा है, यह देखकर निङ्क्षश्चत होने की कोई जगह नहीं है. इसका ध्यान हर मुंबई और महाराष्ट्र वासी को रखना है. गौरतलब है कि राज्य में जिन क्षेत्रों में संक्रमण में कमी आ रही थी, उनमें पिछले दिनों फिर संक्रमितों की संख्या में इज़ाफा हो रहा है. इसका मतलब है कि लोग लापरवाही कर रहे हैं. इससे बचने के लिए जो मापदंड तय किये गए हैं और जो मार्गदर्शिका बताई गयी है उसका सही से पालन नहीं कर रहे हैं. ऐसा करने वालों को अपने चारो ओर नजर डालकर देश के कई हिस्सों की हालत पर गौर कर लेना चाहिए, जहां स्थिति नियंत्रण में नजर आ रही थी, वहीं लोगों की निङ्क्षश्चतता और लापरवाही ने स्थिति खराब कर दी है और वहां की सरकारों को सख्त जुर्माना लगाने और कर्फ्यू लगाने पर बाध्य कर रही है. तो अब आवाम को तय करना है कि क्या उसे फिर लॉकडाउन जैसी स्थित पैदा करनी है या महामारी से सुरक्षित जीवन जीना है. कारण, जब कोरोना नियंत्रित होगा तभी जन जीवन सामान्य होगा, यदि लोग मापदंडों का अनुपालन नहीं करेंगे तो फिर आवाम का जीवन महामारी से प्रभावित हुए बिना नहीं बचेगा. और परिणाम स्वरूप उनके लिए, उनके परिवार के लिए और उनके आस पास की लोगों के लिए समस्या खड़ी करेगा, उनकी बंदिशें भी बढ़ेंगी जो किसी के लिए ठीक नहीं है. इसलिए आवश्यक है कि हम सब इसे सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी न मानकर अपनी जिम्मेदारी मानें और ऐसा करें, जिससे हम और हमारा परिवार सुरक्षित रहे. यदि हर व्यक्ति ऐसा करेगा तो महामारी का प्रसार रुकेगा और दवाई न आने तक काम-काज भी नहीं प्रभावित होगा. अभी भी कई ऐसे पॉकेट जगह-जगह हैं जहां दैनिक रूप से क्षेत्र के दूसरे इलाकों की बनिस्बत ज्यादा प्रभावित निकल रहे हैं. इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। यह यदि लोगों को लापरवाही से हो रहा है तो ऐसी जगहों पर उन्हें सही राह पर लाने के लिए और सख्त कदम उठाने की जरूरत है. आपदा काल के अब तक के समय में दो वर्गों को लेकर सबसे नकारात्मक और आपत्तिजनक स्थिति सामने आ रही है. वह हैं निजी अस्पताल और दूसरा चीजों को अधिक दामों पर बेंचकर व्यापारियों के एक वर्ग के लाभ कमाने की प्रवृत्ति. जिस पर रोक लगाने के प्रयास काफी हो रहे हैं, लेकिन इन पर लाभ कमाने का भूत इस कदर सवार है कि वह संकट के समय भी लोगों को नहीं छोड़ रहे हैं. ये अब भी अपनी कुत्सित और नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं. लगता है इन पर रोक लगाने के अब तक के जितने भी उपाय किए गए वह उतने असरकारक नहीं हैं। जो इन्हें मानवाता, संवेदना, संकट के समय रहमदिली का पाठ पढ़ा सकें. तो इन्हें कैसे राह पर लाया जाये, मानवीय बनाया जाय इस पर भी गहनता पूर्वक विचार कर कदम उठाने की जरूरत है. निजी अस्पतालों के काले कारनामे अब संसद तक गूंज रहे हैं। जिस तरह का असंवेदनशील व्यवहार इन मानव सेवा के लिए समर्पित संस्थानों में हो रहा है और सुर्खियां बन रहा है वह स्पष्ट करता है कि यहां मानव सेवा के आलावा सब कुछ हो रहा है, तो मुनाफ़ा खोर निजी अस्पताल संचालक और व्यापारी इन सबको कैसे उनके कर्तव्यों की याद दिलाई जाय. इस पर नए सिरे से सोचना होगा और प्रभावी कदम उठाना अनिवार्य है नहीं तो आपदा को अवसर में बदलने वाले ऐसे हृदय हीन लोग आम आवाम जो संकट में इनके पास पहुंचती है, उसकी हालत सुधारने की बजाय अपने क्षुद्र लाभ के लिए और खराब करते रहेंगे, उसे लूटते रहेंगे. आदमी महामारी और मुनाफाखोरी के पाटे में पिसता रहेगा

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