जंगल राज के जुड़वा युवराज बनाम सुशासन बाबू

आज बिहार के तीसरे यानी अंतिम चरण का मतदान है. भाजपा जदयू गठबंधन और राजद नीति महागठबंधन में कांटे की टक्कर बताई जा रही है. इस दौरान दो बड़े गठबंधनों के आलावा और अन्य दलों जिनमें से अधिकांश को इन दोनों बड़े गठबंधनों ने वोट कटुवा की श्रेणी का बताया है. सबने अपने-अपने दावों व वादों को लेकर जी भर कर प्रचार किया, और जैसा कि राजनीतिक रूप से ज्यादा सजग, जागरूक और सचेत बिहार जैसे राज्य में होता है, यहां चुनाव के हर रंग देखने को मिले. बिहार का चुनाव हो और हिंसा व टकराव न हो, यह संभव नहीं. अब प्रचार थम गया है, इस बार जो नया दिखा वह मुख्यमंत्री की एक सभा में पत्थर मारने का प्रयास और एक नेता की रैली में विरोधी नेता का नाम लेकर नारेबाज़ी एक ट्रेंड की तरह विकसित हो रही है, जो सर्वथा अनुचित है और प्रजातंत्र की स्वस्थ परम्पराओं के प्रतिकूल है. लेकिन ऐसा कुछ न हो और वह भी बिहार में, यह किसी आश्चर्य से कम न होगा. अब मुकाबला वोट कटुवों के बावजूद भी जंगल राज के जुड़वां युवराजों और सुशासन बाबू के बीच में है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस चुनाव में भाजपा और जदयू की सत्ता बरकरार रहने के लिए अथक मेहनत की है. अब आज शाम को सबके भाग्य का फैसला ईवीएम में बंद हो जायगा. जिस तरह की लाग-डांट इस दौरान दिखी, उससे स्पष्ट है कि सुशासन बाबू जो लम्बे समय से बिहार सरकार में बने हुए है, इस बार अच्छी खासी चुनौती का सामना कर रहे है. प्रचार के अंतिम दिन जिस तरह से उन्होंने आखिरी चुनाव है की भावनात्मक अपील की वह बहुत कुछ बिना बोले कहता हुआ प्रतीत हो रहा है. उनके लिए उत्साहवर्धक बात यह है कि प्रधानमंत्री ने नितीश और भाजपा गठजोड़ के पाले में सžाा बरकरार रखने के लिए चुनाव पूर्व से ही काफी मेहनत की. बिहार के विकास की घोषणाओं एवं अपनी मेराथन चुनाव प्रचार सभाओं के माध्यम से की है. प्रधानमंत्री देश के सबसे लोकप्रिय नेता है, उनके कार्यों का डंका पूरे देश की तरह बिहार में भी बज रहा है, जो लोगों के उद्गारों से स्पष्ट है. जुड़वा युवराजों की तुलना में नीतीश की छवि बहुत अच्छी है ऐसे में भले ही जोर तो विपक्ष ने भी लगया है, लेकिन राजद और उसका मौजूदा नेतृत्व अतीत की ग़लतियों से सबक लेता नहीं दिख रहा है. उनके उम्मीदवारों में अभी भी बाहुबलियों और दागदार लोगों का बाहुल्य है. ऐसे तत्वों के शिकंजे से नीतीश ने अपने कुशल नेतृत्व से राज्य को निकाला और उसकी एक नयी धमक देश और दुनिया में बनाई है. राजद के आने पर फिर बिहार में उन तत्वों का बोलबाला बढ़ने की पूरी आशंका है, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. इन सब कारणों से पिछले चुनाव में राजद के साथ मिलकर सžाा प्राप्त करने के बावजूद भी नीतीश ने उनसे अपना नाता तोड़ भाजपा से हाथ मिलाकर सत्ता बनाई थी, तो इस बार फिर ये दोनों गठबंधन आमने सामने है. यह निर्विवाद रूप से सही है कि जिस अराजक स्थिति में लालू और उनके परिवार व रिश्तेदारों के कुशासन ने बिहार को डाला था, नीतिश कुमार और भाजपा गठबंधन ने न सिर्फ राज्य को उस दलदल से उबारा, बल्कि अपने कार्यों से एक साफ़ सन्देश देश व दुनिया को दिया कि बिहार में भी विकास की गंगा बह सकती है. अब देखना यह है कि इस बार बिहार का मतदाता किसे अगले पांच साल के लिए अपना भाग्य विधाता चुनता है. कारण इस पर बिहार की अगली दिशा तय होगी, और साथ ही परिपक्व नितीश, चिराग व तेजस्वी जैसे नौनिहालों के भाग्य का भी फैसला होगा. इसका निर्णय तो 10 नवम्बर को ही आयेगा, फिलहाल हर ओर से सत्ता हमारी ही होगी की दावेदारी जारी है. देखना यह है कि जुड़वां युवराज और सुशासन बाबू के इस मुकाबले में बिहार की सत्ता सुन्दरी किसका वरण करती है, या कोई और गुल खिलाती है.


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