अब भाजपा बंगाल फतह की तैयारी मे

भारतीय जनता पार्टी ने अब बंगाल फतह की तैयारियों को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है. स्वतंत्रता के बाद से बंगाल में कांग्रेस और उसके बाद वामदल और अब ममता बनर्जी, इन तीनों दलों ने अपने लम्बे शासन काल में ऊपर से तो धर्म निरपेक्षता का नारा बुलंद किया, परंतु उसके नाम पर अल्पसंख्यक परस्ती का जो नंगा नाच वहां ही नहीं, देश के कई राज्यों में उक्त और अन्य समविचारी दलों द्वारा किया गया उससे देश की और बंगाल की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी में धीरे-धीरे एक आक्रोश उत्पन्न हुआ है. उन्होंने बंगाल में कांग्रेस को देखा उसे ख़ारिज किया, उसके बाद वामदलों को लंबा समय दिया. एक जमाने में देश के विकास का इंजन कोलकाता था. वह कैसे धीरे-धीरे अपनी अहमियत खोता गया, कैसे बंगाल से उद्यमी और उद्योग दूर होते गए, यह सर्वविदित है. हिंसा व यूनियन की दबंगई बंगाल की नियत बन गयी थी. ऐसे माहौल में आशा की एक किरण के रूप में ममता बनर्जी बंगाल के राजनीतिक क्षितिज पर उदित हुई. शुरू में कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने अपनी एक आक्रामक जन नेता की छवि बनाई और वाम दलों से दो-दो हाथ किया. जब उन्हें लगा कि वह कांग्रेस में रहते हुए वाम दलों से नहीं लड़ सकती. तो उन्होंने अपनी राह अलग कर ली और तृणमूल कांग्रेस नामक पार्टी का गठन किया और लम्बे अंतराल के बाद वह बंगाल की सत्ता से वाम दलों को बाहर करने में कामयाब हुई. तब से उनका सिक्का चल रहा है. अब मुख्यमंत्री के रूप में उनकी दूसरी पारी पूरी होने को है. उन्हें भी अब अगले चुनाव का सामना करना है, जिसकी दुंदुभी बज रही है. उनका भी वही हाल हो रहा है, जो देश की अन्य क्षेत्रीय पार्टियों का होता है या हुआ है. उन्होंने भी सपा-बसपा-राजद की तरह ही अपनी पार्टी को पारिवारिक पार्टी बनने का उपक्रम शुरू कर दिया है. साथ ही वे भी इन दलों और कांग्रेस की तरह धर्म निरपेक्षता का मतलब अल्पसंख्यक परस्ती ही मानती है. यह दोनों चीजें उनके गले की फ़ांस बन रही है. कारण उनके द्वारा अपने भतीजे को दी जा रही प्राथमिकता अब उनकी पार्टी में उनके खिलाफ बगावत का शंखनाद कर रहा है. उनका अल्पसंख्यक प्रेम राजनीति में उनके खिलाफ धारदार मुद्दा बन रहा है. विकास के फ्रंट पर भी वह ऐसा कुछ नहीं कर पाई जिसकी देश में तो छोड़िये, बंगाल स्तर पर भी व्यापक चर्चा हो. उनके पास अपनी व अपने पार्टी की आक्रामकता के सिवाय बोलने केलिए कुछ नहीं है. साथ ही इस बार जनता के सामाने भाजपा के रूप में एक विकल्प है, जो विशुद्ध रूप से गैर कांग्रेसी विचारधारावाला है, जो पहली बार बंगाल में पूरे दम-खम के साथ जनता के सामने है. अभी तक जितने दल बंगाल की राजनीति में सक्रिय थे, वह कमोबेश कांग्रेस की प्रतिलिपि थे. पहली बार एक ऐसा दल सामने है, जिसकी रीति-नीति और शैली का डंका पूरी देश में बज रहा है. उसकी केंद्र और राज्य सरकारों का काम लोगों को भा रहा है, देशव्यापी जन समर्थन इसका प्रमाण है. बंगाल में लोकसभा चुनाव मे उसका प्रदर्शन शानदार रहा है, अभी चाहे बिहार का विधानसभा चुनाव रहा हो या कई राज्यों के उपचुनाव, उसकी सफलता की आंधी ने इन सभी दलों को धूल धूसरित किया है. आज उसका मनोबल और कार्यकर्ताओं का उत्साह चरम पर है, वह लम्बे समय से बड़े ही सुनियोजित तरीके से बंगाल में पार्टी को और उसके जनाधार को मजबूत कर रहा हैं. ममता की पार्टी के द्वारा सताए जाने और मार खाने के बाद भी उसके कार्यकर्ता पूरे जोश से मैदान में डटे हैं. उक्त सभी बातों का कोई तोड़ ममता के पास नहीं है. वह फिलहाल न तो राज्य की जनता को संभालते नजर आ रही है, और न ही अपनी पार्टी को ही एकजुट रख पा रही है. खाली जुबानी जमा -खर्च से चुनाव नहीं जीते जाते, इसका एहसास उन्हें होता नहीं दिख रहा है. परिणामत: उनकी गाड़ी फंसती साफ़ दिख रही है. आगे भगवान जाने, वह भाजपा का विजय रथ रोक सकती है, ऐसा लगता नहीं.

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