अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयास तेज

अर्थव्यवस्था को ताकत और बंदी के बाद मंद पड़ गए कारोबार को गति देने के मकसद से वित्त मंत्रालय ने एक बार फिर कुछ क्षेत्रों के लिए राहत पैकेज का एलान किया है। इस तरह अब तक जारी कुल राहत पैकेज करीब तीस लाख करोड़ रुपए यानी सकल घरेलू उत्पाद के पंद्रह फीसद तक पहुंच गया है। ताजा पैकेज में सरकार ने उन छब्बीस क्षेत्रों को चिह्नित कर राहत पहुंचाने का प्रयास किया है, जो सबसे अधिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं।

इसमें भवन निर्माण क्षेत्र में बिक्री बढ़ाने और पहले से चल रही परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के मकसद से अतिरिक्त धन मुहैया कराने और खरीद पर सर्किल रेट से बीस फीसद तक कम राजस्व वसूलने की घोषणा की गई है। इसी तरह छोटे उद्योगों में नई भर्तियां करने पर कर्मचारियों की भविष्य निधि में नियोक्ता का अंशदान सरकार की तरफ से किए जाने की घोषणा है। छोटे कारोबारियों के लिए आपातकालीन ऋण योजना की अवधि बढ़ा कर चालू वित्त वर्ष के अंत तक कर दिया गया है। यानी अब उन्हें बिना कुछ गिरवी रखे आपातकालीन कर्ज उपलब्ध हो सकेगा। हालांकि ताजा घोषणा में पुरानी घोषणाओं के ही कुछ प्रावधानों को आगे बढ़ाया गया है, मगर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन आदि के लिए खर्च बढ़ाने जैसे कुछ नए प्रावधान मददगार साबित हो सकते हैं। दरअसल, पूर्णबंदी की वजह से अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरी मार पड़ी है। हालांकि विकास दर पहले ही तीन फीसद के आसपास सिमटने लगी थी, तिस पर पूर्णबंदी ने काम-धंधों की कमर ही तोड़ दी। विकास दर करीब चौबीस फीसद तक नीचे चली गई। सरकार इस स्थिति के जल्दी ही सुधरने का भरोसा दिला रही है, मगर वह खुद भी मानती है कि इस साल अर्थव्यवस्था में संकुचन दस फीसद तक रहेगा। खुदरा महंगाई पर काबू पाना कठिन बना हुआ है। नए रोजगार के अवसर पैदा करना बड़ी चुनौती है। लोगों की क्रय क्षमता घट गई है, इसलिए बाजार में भी रौनक नहीं लौट पा रही। इसका सीधा प्रभाव उत्पादन पर पड़ रहा है। यही वजह है कि जिस औद्योगिक क्षेत्र के बल पर विकास दर का रुख लगातार ऊपर की तरफ बना हुआ था, वह पलट कर नीचे की तरफ हो गया है। इस स्थिति से पार पाने के लिए सरकार लगातार औद्योगिक क्षेत्रों को प्रोत्साहन पैकेज और दूसरी राहत योजनाओं की घोषणा कर रही है। कानूनों को लचीला बना कर कारोबार बढ़ाने के अवसर पैदा करने, कर्ज संबंधी नियमों को आसान बना कर कारोबारियों को बल प्रदान करने की कोशिश कर रही है। बंदी की वजह से बहुत सारे छोटे कारोबार या तो बंद हो गए या उनकी कमर टूट गई। बड़े उद्योग फिर भी संभल कर खड़े हो सके हैं, पर सूक्ष्म, मंझोले और छोटे उद्यमों की स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। इन्हीं क्षेत्रों में रोजगार की अधिक गुंजाइश रहती है। इसलिए इस क्षेत्र को उबारने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया लेकिन स्थिति यह है कि एक अनिश्चितता के वातावरण में पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबे उद्यमी नए सिरे से कर्ज लेकर कारोबार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। फिर, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ाने के प्रयास तो हो रहे हैं, पर वहां भी मनरेगा जैसी योजनाओं से इस दिशा में कोई बड़ी राहत मिलती नजर नहीं आती। इसलिए नई राहत योजनाओं से उद्योगों और बेरोजगार हो चुके श्रमिकों की स्थिति में कितना सुधार हो पाएगा, देखने की बात है।

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