नितीश एक बार फिर मुख्यमंत्री

बिहार में नंबर तीन पर जाने के बाद भी एक बार फिर नितीश कुमार की बहार आ गयी है. वह सातवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं, और उनके मंत्रिमंडल के विभागों का बँटवारा भी चुका है. इस बार उनके साथ भाजपा में उनके विश्वसनीय सहयोगी जो लगभग पन्द्रह साल तक उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर चले वह सुशील मोदी नहीं है, साथ ही उनके साथ ऐसे नए चेहरों की भरमार है जो पहली बार बिहार सरकार में मंत्री पद की शोभा बढ़ा रहे है. इसमें कोई दो राय नहीं कि इस बार कांटे की टक्कर में भले ही महागठबंधन सžाा सुंदरी का वरण नहीं कर सका, फिर भी विपक्ष के रूप में उसकी स्थिति काफी मजबूत है. यही नहीं भाजपा भी बिहार की इस राजग सरकार में जदयू से कहीं ज्यादा सीटें जीत कर इस बार बड़े भाई की भूमिका में है, और जिस तरह उसने बिहार सरकार में भाजपा का नेतृत्व सुशील मोदी से लेकर तारकिशोर प्रसाद और रेणुदेवी को सौंपा है, उससे यह साफ़ जाहिर है कि राज्य व उसके विकास को लेकर और पार्टी के विस्तार के लिए उसमें नयी लीडरशिप विकसित करने की उसकी एक सोची समझी रणनीति है, जिसका अनुभव इस बार अपनी इस पारी में नितीश कुमार पहली बार करने वाले है. जबकि दूसरी ओर बिहार की जनता की भी आकांक्षाएं हैं जो नितीश से ज्यादा प्रधानमंत्री के वादों के चलते बढ़ी है. कारण चुनाव के पहले ही कई ऐसे कामों की शुरुवात प्रधानमंत्री ने करवा दी है, जिनकी बिहार की अवाम दशकों से प्रतीक्षा कर रही थी. उन्हें यह लगना स्वाभाविक है कि अब जब बिहार में राजग सरकार बना गयी है, उसमें और गति आयेगी. बिहार में बहुत कुछ नितीश और भाजपा की संयुक्त सरकारों के नेतृत्व में किया गया है, इसलिए ही नितीश लगातार मुख्यमंत्री बने हैं. बावजूद इसके यदि इस बार प्रधानमंत्री का संबल नहीं मिला होता और उनका करिश्मा नहीं काम आया होता तो नितीश कुमार की लुटिया डूब गयी थी. यह इसलिए हो रहा था कि राज्य की जनता उनके बाढ़ प्रबंधन से और उनकी सरकार द्वारा कोरोना प्रबंधन से नाराज थी, तो अब उन्हें बिहार में विकास की गंगा बहाने में, अराजक और अपराधिक तत्वों की मुश्के बांधने में, बाढ़ और महामारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने में और संजीदगी व प्रामाणिकता दिखानी होगी. विशेषकर बाढ़ नियंत्रण को लेकर कुछ दूरगामी कार्ययोजना बनानी होगी. कारण जिस तरह की तबाही वार्षिक कार्यक्रम की तरह बिहार में साल दर साल बाढ़ के चलते होती है, वह राज्य का, राज्य की आवाम का और प्रकारांतर से देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा नुकसान करती है. कल्पना कीजिए यदि इतनी त्रासदियों के बाद भी बिहार को सुधारने का ख़िताब नितीश के नेतृत्व में राजग सरकार को हासिल है, तो यदि बाढ़ की विभीषिका का असर कम होगा, तो बिहार का क्या हाल होगा? उसका नाम देश के प्रगतीशील राज्यों की सूची में सुमार होगा. यह किया जा सकता है, और भाजपा का यह करना प्राथमिकता होगी. कारण देश के फाइव ट्रिलियन अर्थ व्यवस्था का जो स्वप्न है उसके लिए देश के हर राज्यों को उसकी प्रगति का इंजन बनना होगा. कोई भी राज्य पिछड़ा रहे उससे काम नहीं चलेगा. प्रधानमंत्री का खुद बीमारू राज्यों पर विशेष ध्यान है और उसी तरह के काम उन राज्यों में हो रहे है, जिससे वह देश के प्रगतिपथ की दौड़ में कोई रोड़ा न बने. देखना यह है कि सुशाशन बाबू इस बार आक्रामक विपक्ष और भाजपा के नए तेवर के बीच बिहार के विकास की गाड़ी को कैसी गति प्रदान करते हैं जिससे उनका और उनकी बड़ी सहयोगी भाजपा दोनों का ग्राफ ऊंचा होगा. बिहार में विकास की बहार लाने का जो मंसूबा प्रधानमंत्री का है कैसे पूरा होता है, यह आगे आने वाले दिनों में उनकी सरकार की चाल तय करेगी.


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