नहीं थम रहे महबूबा के बिगड़े बोल

कोई भी राज्य किसी भी खानदान या दल विशेष की बपौती नहीं है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में यही सूरते हाल अनुच्छेद 370 और 35ए हटने के पहले था. लम्बे अर्से तक अब्दुल्ला परिवार वहां का सबकुछ था और बाद में मुफ्ती परिवार भी वहां रसूखदार हो गया. जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला व मुफ्ती परिवार बारी-बारी से हावी रहे और इन्ही के जमाने में घाटी हिन्दू पंडितों से खाली हुई. आतंकवाद अलगाववाद अपने चरम बिन्दु पर पहुंचा, लेकिन ये ऐसे तत्वों से साठ-गांठ के आरोपों के मध्य अपनी चलाते रहे. इस सब कारणों से इनकी एक संदिग्ध छवि भी देश के जेहन में है. अनुच्छेद 370 और 35ए हटने के बाद व लद्दाख और जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित राज्य में तब्दील होने के बाद, इसे देश और वहां की आम-आवाम की स्वीकार्यता मिलने के बाद, इन दोनों परिवारों का बदहवास होना स्वाभाविक है. बदहवास होने के बाद आदमी क्या करता है, वही यह कर रहे है. पहले फारूक अब्दुल्ला ने आपत्तिजनक उद्गारों की झड़ी लगा दी, जब उस पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई तो अब सावधान होकर बयानबाज़ी कर रहे है, लेकिन महबूबा अभी भी अपने आपे में नहीं है जो कभी देश के झंडे को लेकर तो कभी चीन को लेकर कुछ ऐसा बोल रही है, जो उनकी पार्टी के लोगों को भी नागवार गुजर रहा है और जम्मू-कश्मीर की रियाया को नहीं सुहा रहा है, जिससे उनकी राजनीतिक नैया डूब रही है. इन्हें इसका एहसास दिनोंदिन हो रहा है. परिणाम यह है कि वह ऐसा बर्ताव कर रही है, जो इस पुरानी कहावत से चरितार्थ है कि 'सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली'. आज का निजाम और उसके कानून महबूबा को हितकारी नहीं लग रहे है. वह इन्हें जन कल्याण के लायक नहीं लग रहा है, उस रियाया को जिसने दशकों उनके शासन काल में दशकों तक आतंक का कहर झेला और अपने निर्दोष परिजनो को मारे जाते हुए देखा, और इन जैसे नेताओं व अलगावादियों को माल काटते देखा है. अब उस रियाया से इन्हें बड़ी हमदर्दी व चिंता है. यह दिखावा जम्मू-काश्मीर की रियाया अच्छी तरह जानती है. इसलिए इन्हें घड़ियाली आंसू बहाकर लोगों को गुमराह करने का प्रयास बंद कर देना चाहिए. कारण ऐसा कर कुछ नहीं हासिल होगा. आज उनकी और उनके जैसों की हकीक़त पूरा देश ही नहीं, पूरी दुनिया के सामने है जो कश्मीर की रियाया के सामने भी सूरज के प्रकाश की तरह उजागर है. घड़ियाली आं सू बहाकर अपनी राजनीतिक दुकान को पुन: हरा-भरा करने का विचार अब उन्हें त्याग देना चाहिये. उन्होंने जो घटियापन को ही तरजीह देकर उसे अपना स्थायी स्वभाव बना लिया है उसे बदलना चाहिये, नहीं तो वह उन्हें बदहवास ही बनाएगा और जैसे-जैसे उनका यह पागलपन बढ़ेगा, वह ऐसा ही कुछ भी उल्टा-सीधा देश व देश के संवेदनशील मुद्दों को लेकर बोलती रहेगी, तो देश को भी उन्हें लेकर उन पर उन संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने के बारे में सोचना होगा, जो ऐसे आचार-विचार करने वाले लोगों के लिए बनाये गए है. सोमवार को फिर उन्होंने वहां के युवाओं को उनका रहनुमा बनकर या बनने का ढोंग कर बरगलाने की कोशिश की, जिससे उन्हें बाज आना चाहिए और बदलाव की हकीकत को शिरोधार्य करना चाहिए. कारण अब चौधरी बनने का युग जम्मू- कश्मीर में समाप्त हो गया है. फिर भी यदि वह 'सौ-सौ जूता खाए, तमाशा घुस के देखे' की नीति पर ही कायम रहती है, और अपने अतीत की खानदानी चौधराहट कायम रखना चाहती है, तो उनका हासिये पर जाना और धीरे-धीरे तिमिर तिरोहित हो जाना तय है. माहौल खराब करने का उनका प्रयास उनकी ही हालत खराब करेगा. इस बार में उन्हें कोई भी आशंका अपने मन में नहीं रखनी चहिये, कारण देश अब अलगाववाद के विशेषाधिकार की कोई भाषा नहीं बर्दाश्त करेगा. 

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