तोड़ फोड़ की हरकत सिर्फ फजीहत करायेगी

 सत्ता का भी अपना एक नशा होता है, जिसने जितना ज्यादा चखा उसे उससे दूर होना उतना ही खलता है. लालू प्रसाद यादव ने लगभग डेढ़ दशक तक बिहार में एक छत्र राज किया. यह अलग बात है कि उनके शासन काल में बिहार जंगल राज का, जहां कुछ भी चलता है का पर्यायवाची शब्द बन गया था, और जिसकी छाया उनकी पार्टी के ऊपर से सुशासन बाबू के लम्बे कार्यकाल के बाद भी नहीं हट पाई है. यही कारण है कि इस बार राजद ने लालू प्रसाद का नाम भी इस चुनाव में नहीं लिया, और बैनर पोस्टर से भी उन्हें दूर रखा. निस्संदेह उनके पुत्र तेजस्वी के नेतृत्व में पार्टी ने उस समय जबकि लालू का प्रचार लाभ नहीं मिला, शानदार प्रदर्शन किया है, जिसकी पूरे देश ने दखल ली है. लेकिन लालू अब सब गुड-गोबर करने पर आमादा है, और तोड़ फोड़ के बलबूते अपने पुत्र और पार्टी की सत्ता में वापसी चाहते है. यह अलग बात है कि इससे उनकी परेशानियों में काफी इजाफा होता दिखाई दे रहा है. उनके खिलाफ इस तरह के प्रयास करने के आरोपों की झड़ी लग गयी है और मामला उनके खिलाफ याचिका और एफआईआर तक पहुंच गया है. लम्बे समय से लालू चारा घोटालों के मामलों में जेल में हैं, लाख कोशिश करने के बाद भी वह प्रचार के लिए बाहर नहीं आ पाए. ऐसी अवस्था में दूसरी तरह के चारा डालने की उनकी कोशिश सर्वथा अनुचित और आपत्तिजनक है. वह शायद यह भूल गये हैं कि वह मोदी का काम और करिश्मा ही है, जिसने उनके पुत्र के मंसूबों पर पानी फेर दिया है. तो ऐसे लोग इतने असावधान नहीं रहेंगे कि कोई उनके विधायक तोड़ दे. उन्हें पता है कि उनके पास सिंपल मेजोरिटी है और महागठबंधन उसमे सेंध लगाने का प्रयास कर सकता है, परिणामत: वे लोग भी सतर्क है. लालू को इसी से संतुष्ट होना चाहिए कि बिना उनके सहयोग से उनके पुत्र ने पार्टी को मजबूती से खड़ा किया है, और चुनावी समर में भी अपनी अहमियत साबित की है. तो उन्हें अपने तरीके से आगे बढने का मौका देना चाहिए. सत्ता पाने की जल्द बाजी में अनैतिक दावं पेंच रचकर उसका खेल नहीं बिगड़ना चाहिए था. इससे लालू की फिर से जो फ़ज़ीहत शुरू हो गयी है, उससे भी वह बच जाते. लालू और उनकी जैसी राजनीतिक सोच के प्रतीकों ने जिस तरह राजनीति को देश और राज्य के विकास और जनकल्याण का माध्यम मानने की बजाय स्वयं और स्वपरिवार के कल्याण का आधार माना और राज्य व अवाम का बंटाधार होने दिया, उसकी कलई आज देश के सामने खुल गयी है. यही कारण है कि आज ऐसे सारे दल अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे है. ये सब दल कांग्रेस की विचारधारा से अलग होकर उसी के एजेंडे पर चल कर और उससे ही साठ-गांठ कर अपनी पार्टियां निजी कंपनियों की तरह चलाते रहे है. इनकी प्राथमिकता आवाम का भला कम, कंपनी का भला ज्यादा रहा है. इसलिए ये राज्य निजी स्वार्थी तत्वों के गढ़ बन गए और असामाजिक तत्वों का राजनीति में बोलबाला हो गया. अब मोदी युग में उसकी केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारें केंद्र में आवाम का भला रख कर ऐसे तत्वों को सतत झकझोरा जा रहा है, और वे कमजोर होकर भरभरा कर गिर रहे है, इसका एहसास इन दलों को हो जाना चाहिए. परिवारवाद, जातिवाद और अल्पसंख्यक-परस्ती का युग अब समाप्त हो रहा है. कारण जनता को अब पता चल चुका है कि इस राजनीति का मतलब कुछ परिवारों और नेताओं का भला है. लालू के बिना भी तेजस्वी ने उक्त वादों के बलबूते ही अच्छा प्रदर्शन किया है, लेकिन जब विकास का मुद्दा सामने आया और सुशासन की तुला पर वे तौले गये तो वे पीछे रह गए. उन्हें अब तोड़-फोड़ की राजनीति के बजाय अपनी पार्टी को इस तरह चलाने की जरूरत है कि वह बदले भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप अपने को ढाल सकें, तभी कुछ हो सकता है, नहीं तो पार्टी डूब जायगी. कारण अब सत्ता के मायने बदले गए है, तोड़-फोड़ की हरकत सिर्फ फजीहत ही करायेगी. 

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