घेरे में ममता दीदी

 अगले साल होने वाले पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव का समय जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, ममता दीदी अपने ही गढ़ में अपने आपको घिरा पा रही है, और जिस तरह का प्रतिसाद आज बंगाल में भाजपा को मिल रहा है और जिस तरह से टीएमसी के दिग्गज एक-एक कर पार्टी छोड़ कर भाजपा का दामन पकड़रहे है, उससे यह साफदिख रहा हैं कि दीदी के पैरों तले जमीन खिसक रही है. यदिअभी भी वह नहीं सचेती, तो जीतना तो दूर उन्हें अपना अस्तित्वबचाना भी मुश्किल होगा. इस में कोई दो रायनहीं कि भाजपा पूरे देश, में और विशेष कर उन राज्यों में जहां उसका आज तक कोई खास जनाधार नहीं रहा है, मोदी युग में वहां अपने आपको मजबूत करने के लिये हर संभव प्रयास कर रही है और राजनी कि तरकश के हर तीर का इस्तेमाल कर रही है. गत लोकसभा चुनाव में उसे पूरे देश में अभूतपूर्व सफलता मिली और बंगाल में भी उसने शानदार प्रदर्शन किया. उसके बाद राज्य पर अपनी पकड़ मजबूत करने का उसका अभियान पूरे जोर-शोर से जारी है. जैसे-जैसे चुनावी दंगल नज़दीक आ रहा है, उसमें और तेजी आ रही है. इसमें कोई बड़ी बात नहीं है कि सत्ताके लिए हर दल द्वारा अपना एडी चोटी का जोर लगाना एक प्रक्रिया है. बड़ी बात यह है कि भाजपा के इस ज़ोरदार अभियान के साथ ही दीदी की पाटी में भगदड़ मची हुई है. जिस तरह ममता की पार्टीके लोग उनकी पार्टीको छोड़ कर भाजपा का दमान पकड रहे है, और उस पर जिस तरह की बौखलाहट भरी प्रकिया टीएमसी प्रमुख दे रही हैं, जिस तरह उनके कार्यकर्ताओं पर हिंसा के आरोप लग रहे है और जिस तरह का प्रतिसाद भाजपा नेताओं की रैलियों, रोड शो और सभाओं को मिल रहे है साफ जाहिर हो रहा है किएक दशक से बंगाल का भाग्यविधाता बनी ममता की हालत इस बार बेहद खराब है. इसका कारण साफहै कि ममता ने लम्बे समय तक बंगाल में राज कर रहे वाम दलों को सत्तासे रुखसत करके वहां की मुख्यमंत्री बनी थी, आगे उन्होंने उसी ब्रांड की राजनी कि बढ़ावा दिया और बंगाल में अर्थव्यवस्था को सही करने के लिए कुछ नहीं कर सकी. यही नहीं जिस तरह वह अपने संघर्ष के दिनों में माकपा कार्यकर्ताओं द्वारा उनके कार्यकर्ताओं के साथ हिंसा, मार-पीट और आतंकित करने का आरोप लागाती थीं आज वहीं आरोप उन पर भाजपा लगा रही है. इस पर राज्यपाल खुद खराब कानून व्यवस्थाका मसला सतत उठा रहे हैं. यही नहीं ममता द्वारा उनके भतीजे को अपना उत्तराकिरी बनाने का प्रयास और उसके चलते वरिष्ठनेताओं को यथोचित वरीयता न मिलना भी उनकी पार्टी में असंतोष और पलायन का सबसे बडा कारण है. यह कोई पहला मौक़ा नहीं है, इसके पहले भी कई ऐसी पार्टियां जो राजनीकि पार्टियां न रहकर परिवारवादी उपक्रम बनने की दिशा में आगे बढ़ीऔर उनकी भी दुर्गति हुई और हो रही है. ममता ने उन सबसे कोई सबक लेने के बजाय उसी राह पर चलना शुरू किया है, तो फिर उनकी अवस्था भिन्न कैसे होगी. क्षेत्रवाद, परिवारवाद का रणनीकि मेल कई परिवारों को राजनीति में बहुत आगे ले गया, लेकिन एक सीमित समय तक. जब तक उक्तदोनों वादों का उपयोग उक्तदलों ने एक सीमा में किया लेकिन जब उपयोग सीमा से ज्यादा बढ़ गया तो जनता ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाते हुए हासिये पर लाकर पटक दिया. आज यह दौर पूरे देश में करीब करीब खत्महै. आज सर्वत्र किस और राष्ट्रवाद की आंधी चल रही है, जिस पर ममता खरी नहीं उतर पा रही है. आज परिवारवाद के चलते उनकी पार्टीके लोग उनसे दूर जा रहे है, राज्यका किस न होने के चलते जनता. उस पर भाजपा जैसे तगडे प्रतिद्वंदी से दीदी का मुकाबला है. मतलब घेरा बंदी पूरी हो गयी है. अब देखना यह है कि ममता अन्दर और बाहर की इस घेरा बंदी से कैसे बाहर कि लती है, या अन्य छोटेदलों की तरह वह भी हासिये की खिलाड़ी बन जाती है.


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