हर पक्ष समझदारी से काम ले

किसान आंदोलन की आड़ में खालिस्तानी, आतंकी या उपद्रवी तत्वों के सक्रिय होने और उनकी मनसा हिंसा करने की है. खुफिया एजेंसियों का ऐसा संकेत विचलित करने वाला है, जिन मांगो का हवाला शुक्रवार को कृषि मंत्री ने दिया वह भी कुछ इसी तरह के संकेत दे रहे है. कारण वे मांगें वहां लगने वाले पोस्टर, किसानों की मांगो से तालमेल दिखाते नहीं दिखते. आवश्यक है कि ऐसी बातों और घटनाओं को आन्दोलनकारी और उनके नेता और सरकार संजीदगी से ले. कहीं ऐसा न हो कि इसकी आड़ में कुछ ऐसा शुरू हो जाय कि सबको लेने के देने पड़ जाय. किसान देश का अन्नदाता है, हर कोई चाहता है की उसकी बातें सुनी जाय और उनका यथोचित समाधान भी हो, इस पर केंद्र सरकार भी सतत प्रयत्नशील है. उनकी आशंकाओं का समाधान करने के लिए उसने प्रस्ताव भी दिया है, परंतु सब कुछ खारिज कर सिर्फ कानून को रद्द करने पर ही अड़े रहना सही नहीं कहा जा सकता. तो यह गतिरोध जल्दी समाप्त होना चाहिए, इसके लिए सरकार और संगठनों दोनों ओर से पूरी गंभीरता अनिवार्य है. प्राय: ऐसा पाया गया है कि जिस तरह की स्थिति इस आंदोलन को लेकर बनी है, वैसी स्थितियों का असामाजिक व देश विरोधी तत्व फायदा उठाते है वैसा न हो, इसकी खबरदारी बरतना हर आन्दोलनकारी की जिम्मेदारी है. विपक्षी दल भी जो इस मामले पर सरकार को छकाने का स्वर्णिम अवसर मान कर हवा दे रहे है, उन्हें भी यह नहीं भूलना चाहिए कि यह अवसर महामारी व सीमा पर तनातनी का है. हमारे पड़ोसी चीन व पकिस्तान जैसे शत्रु और देश में छिपे बैठे उनके पिट्ठू व देश के अन्दर असामाजिक तत्व हमेशा इस ताक में रहते है कि उन्हें अपना कुछ काला कारनामा करने का अवसर प्राप्त हो, तो ऐसा कुछ न हो इसके लिए सबको सतर्क रहना होगा और मामले का जल्दी समाधान हो इस तरह से सत्ता पक्ष, विपक्ष और आन्दोलन के अगुवाओं को कार्य करना होगा.


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