बड़ी मुश्किल भरी है आगे की कांग्रेस की डगर

 मुंबई महानगरपालकिा चुनाव की तिथि जैसे जैसे   नज़दीक आ रही है. राज्य के विभिन्न राजनीतकि खेमों में हलचल तेज हो गयी है. कांग्रेस ने मुंबई के लिए अपने नए अध्यक्ष की घोषणा कर दी है. उसके साथ जितने भी अध्यक्ष पद के दावेदार थे उनको भी कोई न कोई ज़िम्मेदारी संगठन में देकर पार्टी अलाकामान ने  पार्टी को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया है. अब यह देखना है कि यह प्रयोग पार्टी की गाड़ी को जो मुंबई में पहली से काफी खराब है और कांग्रेस अपना अस्तित्व बचाने के जद्दोजहद में है, कितना कामयाब बनाती है. प्रथम दृष्ट्या पार्टी गुटवाद से उबर पाई है ऐसा नहीं लगता. कुछ नेताओं ने इस नयी कमेटी में मारवाड़ी और हिंदी भाषी समुदाय की अनदेखी पर सवाल खड़ा किया है. अभी जबकि नए अध्यक्ष की घोषणा हुए कुछ दिन ही बीते है, उनके भावी कार्यकाल को लेकर कुछ कहना ठीक नहीं होगा, लेकिन इस चुनावी वर्ष में वह मुंबई कांग्रेस की गाड़ी किस तरह चलाते है, और उसे साल भर बाद होने वाले मुंबई पर मनपा चुनाव में किस तरह सम्मान जनक स्थित पार लाते है, उस पर मुंबई में पार्टी का भविष्य निर्भर होगा. जिस पर उनके और उनके विरोधी दलों दोनों ओर के कार्यकर्ताओं और नेताओं की नजर रहने वाली है. राज्य में तीन पार्टी की महावकिास अघाड़ी  सरकार सत्ता में है, जिसमें कांग्रेस तीसरी पार्टनर है. कांग्रेस कार्यकर्ताओं को यह बात परेशान कर रही है कि इस सरकार में उनकी पार्टी का भी कोई योगदान है ऐसा समाने नहीं आ रहा है, जबकि राकांपा की धमक दिन दूना, रात चौगुना बढ़ रही है, जिसके चलते कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी राकांपा का दामन पकड़ना शुरू कर दिया है और यदि पार्टी का यही हाल रहा तो आगे कांग्रेस से राकांपा में जाने वालों की कतार लंबी हो सकती है. इधर यूपीए अध्यक्ष के लेकर नया बखेड़ा शुरू हो गया है, जिससे कांग्रेस और शिवसेना में एक नया विवाद  शुरू हो गया है, और कांग्रेस को यहां तक कहना पड़ा कि शिवसेना यूपीए में नहीं है, इसलिए उस पर टिप्पणी न करे. प्रदेश स्तर पर भी पार्टी में स्थिति अस्पष्ट है. कारण प्रदेश अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी संभाल रहे थोरात राज्य के राजस्व मंत्री भी हैं. इस तरह जितना समय चाहिए उतना संगठन को नहीं दे पा रहे है. कार्याध्यक्षों की भी फ़ौज है, लेकिन पार्टी अभी इस तरह चुस्त-दुरुस्त नहीं हो पायी है कि आनेवाले स्थानीय नकिाय चुनावों का सही तरीके से मुकाबला कर सके. कांग्रेस हलकों में चर्चा तेज है कि जल्द ही प्रदेश को भी नया अध्यक्ष मिल जाएगा लेकिन तब तक कहीं देर न हो जाय यह दर्द कार्यकर्ताओं को सता रहा है. अब देखना यह है कि कांग्रेस राज्य में अपने वजूद को बचाने के लिए कौन सा जादुई फार्मूला इजाद करती है. देश की तरह ही इस राज्य में भी जो एक जमाने में कांग्रेस का मजबूत गढ़ था कांग्रेस ने अपनी नीतियों से एक-एक कर सारे समर्पित मतदाता वर्ग को अपने से दूर जाने दिया. आज कोई भी ऐसा वर्ग नहीं है जिसे पार्टी यह कह सके कि वह पूरी तरह से हमारे साथ है, तो आगे वह अपना अस्तित्व कैसे बरकरार रखेगी, यह देखना काफी दिलचस्प होगा. कारण भाजपा िजसे इन तीन दलों के गठबंधन ने राज्य की सत्ता से दूर किया, अपने दम पर मजबूती से इनका मुकाबला करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है, और रोज इन्हें घेर रही है. राकांपा भी वही कर रही है और शिवसेना का अपना एक समर्पित समर्थक वर्ग है जबकि अाज कांग्रेस की सबसे कमजोर नजर आ रही है. कारण न उसके पास मतदाता है न एकता और न ही कोई ऐसी रणनीति जो उसकी नैया पार लगाता दिखे तो ऐसे में कांग्रेस की राज्य में पनघट तक पहुंचने की डगर काफी मुिश्कल भरी दिखती है, आगे राम ही मालकि है.


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