माया मिली ना राम

बडे बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले. नेपाल के प्रधानमंत्री ओली की हालत कुछ वैसी ही हुई है, उन्हें संसद भंग करने की सिफारिश करनी पड़ी और अब उनके हाथ से पार्टी अध्यक्ष पद और पार्टी की चेयरमैन पद भी जा चुका है चीन की अंध भक्ति और उसके वशीभूत होकर सदियों के हमारे रिश्ते को प्रभावित करने और चीन प्रेम में नेपाल के हितों तक की अनदेखी की उनकी नीति ने उनके खिलाफ उनकी ही पार्टी और देश की आवाम में विरोध को जो बीजारोपण किया वह धीरे-धीरे एक ऐसे भूचाल में परिवर्तित हो गया कि उन्हें ही आत्म-समर्पण कर देना पड़ा. उनके सामने संसद भंग करने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा और उन्होंने पूरे देश को चौंकाते हुए उसे भंग करने की सिफारिश कर दी. देश फिर 30 अप्रैल से 10 मई के बीच चुनावी दंगल का सामना करेगा. चीन का साथ किस तरह आदमी को कहीं का नहीं रखता इसका यह जीता जागता उदाहरण है आज पाक किस तरह उसकी कठपुतली है और श्रीलंका में उसने क्या किया और मालदीव में क्या करना चाहता था ओली सब कुछ जानते थे. सब कुछ जान कर इससे भी ओली ने कोई सबक नहीं लिया. चीन को अपने देश के आंतरिक मामलों तक में हस्तक्षेप करने दिया. 

देर से ही सही उन्हें चीन की कुत्सित चाल का आभास हुआ और उन्होंने हमारे साथ संबंध सही करने की दिशा में अच्छी पहल की इसका असर भी दोनों और दिख रहा है. लेकिन इन सबसे उनके प्रति उनके देश में विरोध और पार्टी में आक्रोश कम नहीं हुआ और जिसका परिणाम है कि आज वह नेपाल की सियासत में पूरी तरह अलग थलग दिख रहे हैं वह सत्ता के मोह में जिस तरह चीन की पिछलग्गू बनने चले थे उसने उनकी हालत इस कहावत की तरह कर दी की कि ‘चौबे जी गए थे छब्बे बनने दुबे जी बन के लौटे’. इसलिए व्यक्ति को चाहे सार्वजनिक हो या व्यक्तिगत जीवन हो अल्पकालिक लाभ के लिए दीर्घकालीन और समय की परीक्षा पर खरे प्रगाढ़ रिश्तों पर कभी भी प्रहार नहीं करना चाहिए. कारण नया कैसा है आपको जानने में समय लगेगा और यदि वह चीन जैसा निकला तो आपका ओली जैसा हाल होगा. सार यह है कि आपकी हालत ‘दुविधा में दोनों गए माया मिली ना राम’ जैसी होगी और आज ओली इसी मुकाम पर पहुंच गए हैं.



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