अतार्किक और अनावश्यक विवाद

खेल  की दुनिया में राजनीतिकों की दखलअंदाजी के मसले पर अक्सर विवाद उठते रहे हैं, लेकिन कई बार कुछ बातें ऐसे अतिरेक में चली जाती हैं जिनका हासिल बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं होता। जबकि हो सकता है कि ऐसे मामलों पर सार्वजनिक रूप से विवाद होने के पहले ही असहमतियों पर विचार-विमर्श का रास्ता अपनाया जाए तो शायद कोई हल निकल आए। राजधानी दिल्ली में फिरोजशाह कोटला स्टेडियम परिसर में अरुण जेटली की प्रतिमा लगाने के मुद्दे पर स्पिन गेंदबाजी के लिए मशहूर रहे पूर्व किक्रेट खिलाड़ी बिशन सिंह बेदी ने जो रुख अख्तियार किया है, उससे यही लगता है कि आपसी संवाद की कमी किसी साधारण मामले को बहुत जटिल बना दे सकती है।

गौरतलब है कि डीडीसीए यानी दिल्ली और जिला क्रिकेट संघ कोटला स्टेडियम परिसर में दिवंगत भाजपा नेता अरुण जेटली की याद में उनकी एक प्रतिमा लगाने जा रहा है। बिशन सिंह बेदी की शिकायत है कि क्रिकेट के स्टेडियम में एक नेता की मूर्ति बनाना शोभा नहीं देता है। इससे असहमति के बाद बेदी ने कोटला की दर्शक दीर्घा से अपना नाम हटाने के लिए कहा है और दिल्ली और जिला क्रिकेट संघ की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है।

 निश्चित रूप से किसी मसले पर असहमतियों का अपना महत्त्व है। दिवंगत अरुण जेटली की प्रतिमा लगाने के मुद्दे पर बिशन सिंह बेदी की प्रतिक्रिया खेल के क्षेत्र को बेहतर तस्वीर देने की फिक्र से जुड़ी हो सकती है। लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि देश में कुछ अन्य स्टेडियम या दूसरे खेल परिसर हैं, जिनका नाम किसी नेता के नाम पर रखा गया है और इन परिसरों में खेल के क्षेत्र में बड़ी-बड़ी उपलब्धियों की जमीन रची गई है। खेल के लिए दिए जाने वाले कुछ पुरस्कार भी जिन शख्सियतों के नाम पर रखे गए हैं, उन्हें किसी अन्य महत्त्व के लिए जाना जाता रहा है।

 अरुण जेटली 1999 से 2013 के बीच करीब चौदह साल तक डीडीसीए यानी दिल्ली और जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष रहे। ऐसे में अगर डीडीसीए को लगता है कि अरुण जेटली की स्मृति में किसी स्टेडियम में उनकी प्रतिमा लगाई जाए तो यह इतने बड़े विवाद का विषय नहीं होना चाहिए, जिसके चलते बिशन सिंह बेदी जैसे महान खिलाड़ी को इतना सख्त रुख अख्तियार करना पड़े। इस मामले में एक सवाल यह जरूर उठता है कि क्या स्टेडियम में प्रतिमा लगाने के मसले पर अलग-अलग पक्षों के साथ विचार नहीं किया जाना चाहिए था, ताकि ऐसी अप्रिय स्थिति नहीं पैदा हो!

 यह सही है कि खेल संगठनों में राजनीतिकों को ऊंचे पदों पर बिठाए जाने को लेकर सवाल उठते रहे हैं। किसी भी खेल से जुड़े संगठन में वैसे व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने की वकालत की जाती रही है, जो संबंधित खेल का विशेषज्ञ हो या अपने योगदान के लिए जाना जाता हो। निश्चित रूप से यह खेल की बेहतरी के प्रति वाजिब चिंता है। लेकिन एक पक्ष यह भी है कि अगर किसी राजनीतिक ने खेल संगठन का अध्यक्ष या अन्य महत्त्वपूर्ण पद पर रहते हुए संबंधित खेल को लेकर कुछ ठोस काम किया हो, तो उसे कैसे देखा जाएगा!

 खेल परिसर किस नेता के नाम पर हो या वहां किसकी प्रतिमा लगाई जाए, इससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि खेल और खिलाड़ियों के हित में कितना और कैसा काम किया गया। जरूरत इस बात की है कि फिरोजशाह कोटला परिसर में प्रतिमा लगाने के ताजा विवाद पर संबंधित पक्षों के बीच संवाद हो और एक सद्भावपूर्ण फैसले पर सहमति बने। इस तरह के अप्रिय विवाद से कम से कम खेल के हित को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

देश में ऐसे नेताओं की भरमार रही है िजन्होंने िकसी खेल िवशेष में महारत न होने के बावजूद भी अपने कार्य से उस खेल को काफी आगे बढ़ाया है। स्व. जेटली जैसे नेताओं की दृष्टि िसर्फ राजनैितक क्षेत्र तक ही नहीं सीमित थी बल्कि राजनीित में रहते हुए उन्होने खेल, कानून, समाज सेवा आिद क्षेत्रे में भी अपनी उल्लेखनीय सेवाए दी है और अपने योगदान से इन क्षेत्रो का गाैरव बढ़ाया है। आज भी देश में खेल से संबंिधत ऐसे संस्थानो िक कमी नहीं है िजनका नामकरण राजनेताओं के नाम पर िकया गया है। 

इससे उक्त खेल की गरीमा या उसके प्रसार में कोई कमी नहीं आई है। अलबत्ता उसे समर्थन और प्रोत्साहन ही िमला है। ऐसे में िकसी खेल संस्थान का नाम स्व. जेटली के नाम हो जाने से या उनकी मूिर्त लगाने से उसपर कोई फर्क पड़ेगा ऐसा कैसे माना जा सकता है। वेदी और कीिर्त आजाद वरिष्ठ िखलाड़ी रहे है। इनका लंबे समय तक क्रिकेट से जुड़ाव रहा है। कीिर्त आजाद तो राजनीित में भी सक्रिय है। ऐसे लोगो द्वारा स्व. जेटली जैसे नेता की मूिर्त लगाने पर िववाद खड़ा करना समझ से पड़े है। यह उनके द्वारा एक िनरर्थक िववाद पैदा करने से ज्यादा कुछ नहीं लगता। यह प्रथम दृष्टया गैर जरूरी और अतािर्कक िववाद लगता है।

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